Friday, April 1, 2016

जनप्रतिनिधियों का वेतन मोह

योगेश मिश्रा
April 01, 2016
रायपुर

लोकतंत्र में विपक्ष कोतवाल की भूमिका में होता है। वह सरकार की हर गलती पर गिद्ध जैसी पैनी दृष्टि रखता है। इधर सत्तापक्ष चूका नहीं, उधर विपक्ष हावी हो जाता है। संसद हो या विधान सभा, सरकार को किसी भी मुद्दे पर विपक्ष की सहमती हासिल करने के लिए  अच्छी-खासी मशक्कत करनी पड़ती है। परन्तु एक विषय ऐसा भी है जिसपर सरकार और विपक्ष "तू डाल-डाल, मैं पात-पात" वाली कहावत को चरितार्थ करते नज़र आते हैं - जनप्रतिनिधियों का वेतन। दरअसल जनसेवा की भावना से ओतप्रोत राजनीति में कदम रखने वाले जनप्रतिनिधि वेतन के मामले में कोई समझौता नहीं करते - फिर चाहे किसान सूखे की मार से मर रहे हों अथवा देश-प्रदेश की माली हालत खस्ता हो - वेतन में बढ़ोतरी जरुरी है।

छत्तीसगढ़ विधान सभा में विधायकों के वेतन-भत्ता-पेंशन आदि से सम्बंधित चार विधेयक मिनटों में पारित हो गए परन्तु कांग्रेस के निलंबित विधायक अमित जोगी ने इस मुद्दे को सूखा-पीड़ित किसानों की भावनाओं से जोड़कर एक नई बहस छेड़ दी है कि जो प्रदेश

किसान-आत्महत्या मामले में देश में चौथे पायदान पर चढ़ गया है और सरकार धान-बोनस के मामले में किसानों को साल-दर-साल छल रही है, वहां विधायकों की वेतन वेतन-वृद्धि कितनी जायज़ है।

वैसे तो जनप्रतिनिधियों की वेतन-वृद्धि कोई नई बात नहीं है, परन्तु विरोध में उत्पन्न स्वर अनेक प्रश्न खड़ा करते हैं - फिर भले ही विरोधियों की मंशा इसके आड़ में अपनी राजनैतिक पृष्ठभूमि मजबूत करने की हो अथवा अस्तित्व बचाने की।

यदि सुधारवाद के इस दौर में अफसर/कर्मचारियों की पदोन्नति और वेतन-वृद्धि के लिए परिणाम-मूलक प्रदर्शन को मानदंड बनाया जा सकता है तो यही सूत्र सांसदों और विधायकों के लिए क्यों नहीं अपनाया जाता? यदि जनप्रतिनिधियों को वेतन दिया जा रहा है तो उनकी जवाबदेही भी तय करनी होगी।

जिन क्षेत्रों से जनप्रतिनिधि चुनकर आते हैं, वहां उनके द्वारा किये गए कार्य और लाये गए बदलाव के आधार पर ही उनकी वेतन-वृद्धि का दर तय किया जाना चाहिए। हालात तो यह है कि सांसद और विधायक अपने क्षेत्र के लिए आबंटित निधि का भी सदुपयोग नहीं कर पाते।

इन जनप्रतिनिधियों के लिए कृषि व् किसान केवल राजनैतिक मुददे भर रह गए हैं, वर्ना क्या कारण है कि एक तरफ तो केंद्र और राज्य सरकारों ने योजनाओं का पिटारा खोलकर रखा हुआ है और दूसरी तरफ देश भर में किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं? यदि जनप्रतिनिधि सक्रीय होते तो क्या वे अपने क्षेत्र के किसानों को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं दिलाते – फिर चाहे वह समय पर फसल बीमा दिलाने की बात हो या फसल नुकसान होने की अवस्था में दूसरी फसल लेने के लिए सोसाइटीयों से खाद-बीज दिलाने की? राजनैतिक नारों से किसानों का भला नहीं होगा, उनके लिए जमीनी स्तर पर कार्रवाई दिखना चाहिए।

राष्ट्रिय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार पिछले 15 वर्षों में देश में करीब डेढ़ लाख किसानों ने आत्महत्या की है और इसके मुख्य कारण हैं – आर्थिक तंगी, कर्ज और खराब फसल।

किसान-आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र और तेलंगाना पहले और दूसरे स्थान पर हैं तथा मध्य प्रदेश तीसरे पर। जब महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ में किसानों की दुर्गति देखकर नाना पाटेकर सरीखे अभिनेता उनकी मदद के लिए आगे आ सकते हैं तो वेतन लेने वाले सांसद और विधायक अपने क्षेत्र में यह कार्य क्यों नहीं कर सकते?

केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार शहरों और गाँवों की तस्वीर बदलना चाहती है। इसके लिए स्मार्ट सिटी और सांसद आदर्श ग्राम योजना प्रारंभ की गई है। मोदी चाहते हैं सांसद गाँवों को गोद लें और वहां विकास के नए पैमाने स्थापित करें। इसी तर्ज पर छत्तीसगढ़ ने विधायक आदर्श ग्राम योजना प्रारंभ की है। गाँवों की स्थिति तभी सुधरेगी जब किसान आर्थिक रूप से मजबूत होंगे। इसके लिए वेतन-वृद्धि की चाहत रखने वाले सांसदों और विधायकों को कमर कसकर काम करना होगा, कागजों में विकास की गति का आंकलन करने से कुछ नहीं होगा।

केंद्र व् राज्य सरकारों को भी चाहिए कि वे गैर-जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों की वेतन-वृद्धि सहित सभी सुविधाएँ उसी तरह रोक दें, वैसे ही जैसे निजी संस्थानों में होता है। वेतन का मोह है तो काम करें। यदि समय रहते जनप्रतिनिधियों को उनकी जिम्मेदारी का आभास नहीं कराया गया तो उनके बढ़ते वेतन के साथ-साथ आत्महत्या करने वाले किसानों की तादाद भी बढती जाएगी।

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