Saturday, December 19, 2015

Hopes and despairs


Yogesh Mishra
December 19, 2015

What a mockery of democracy? After getting bail on National Herald case, Sonia and Rahul Gandhi addressed the media as if they have won any war against injustice. And look at the media! Almost all the news channels have started analyzing this episode as major turning point in the life of Gandhi family and prognosticating that Congress would wrest power from BJP in future.
This is strange! Sonia and Rahul belong to the dynasty that ruled the nation for longest period, but barely did anything for the poor who blindly voted them in every election.
Ironically, in over six and a half decades, this dynasty's earnings increased to billions (or trillions) - thanks to fund flow from the defunct newspaper, hundreds of trusts and organizations. Two years back, Huffington Post had reported that Sonia, with $2 billion wealth, was 12th richest politician of the world, but later it removed her from the list - you can imagine what kind political pressure would have been mounted on it.
Nevertheless, Sonia and Rahul claim that they are the cleanest politicians, by heart and deeds. Will anybody remind Sonia that her son-in-law Robert Vadra is still embroiled in illicit land deal cases? In fact, the entire nation knows who Vadra was 20 years back and what he has become now, just by connecting to Gandhi family.
I can't understand how you can you call yourself a holy person when everybody knows that you are a sinner? And what we call defenders/supporters/protectors of criminals? Obviously criminals. Isn't it? Then how come the blind supporters, who call themselves top and influential politicos of the country with unique brand value and reputation, would face the common man after backing Sonia and Rahul? But they will. They are rather comparing the latest development in Gandhi family's life with resuscitation of Indira in Indian politics after her brief jail imprisonment on corruption charges back in 1977.
The supporters might even be right because the common man doesn't know whether to apply wisdom or not during elections. Of late, you can see what happened in Bihar. Lalu's RJD got more seats than that of Nitish Kumar's JD(U).

Tuesday, December 8, 2015

हंसा तो मोती चुगे: असहिष्णुता की बातें

योगेश मिश्रा
दिसम्बर ०८, २०१५
बात-बात में बात बढ़ गई है। कुछ लोगों ने अपना सम्मान क्या लौटा दिया, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र व एकमात्र धर्मनिरपेक्ष देश भारत - जिसे ज्ञान, संस्कृति और सहनशीलता का पैमाना माना जाता रहा है - अचानक असहिष्णु हो गया। और लांछन लगाने वालों की भीड़ पर जरा गौर तो फरमाइए - ऐसे-ऐसे चेहरे हैं जिन्होंने अपनी राजनीतिक जड़ें मजबूत करने के लिए सदैव सहिष्णुता को दरकिनार कर, जाति व् धर्म का दांव खेल, समाज को विखंडित करने का कार्य किया है।
आश्चर्य है असहिष्णुता का राग अलापने वालों ने कभी इतिहास में झाँककर देखने की जहमत नहीं उठाई। इस देश को पहले मुगलों ने लूटा, फिर अंग्रेजों ने। इन लुटेरों के कहर से संपत्ति बची, ना आबरू। धार्मिक स्थलों के साथ-साथ जनमानस की भावनाओं पर इन आततायीयों ने ऐसा आघात पहुँचाया कि किसी के भी रोंगटे खड़े हो जाएँ। करोड़ों हिन्दुओं को मुसलमान और इसाई बना दिया गया। भाई-भाई को दो धर्मों में बाँट दिया गया। अब सहनशीलता का इससे बड़ा प्रमाण और कहाँ मिलेगा?
आजादी के बाद देश में सबसे अधिक वर्षों तक कांग्रेस ने राज किया। इस दल ने सबसे ज्यादा चिंता की गरीबों और मुसलमानों की, परन्तु उनके लिए किया कुछ भी नहीं। कांग्रेस छह दशकों तक गरीबी हटाओ चिल्लाती रही और इस दौरान लाखों गरीब मिट गए। आजादी के बाद मुसलमानों का एक बड़ा तबका भी गरीबी से जूझ रहा था। तिस पर तुर्रा, कांग्रेस ने उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा देकर विशेष कृपा दिखाने का प्रयास किया। परन्तु अंततः हुआ क्या? लाखों की तादाद में हुनरमंद युवा मुसलमान सही अवसर व् मार्गदर्शन के आभाव में इधर-उधर भटकते रहे। बहुतों ने गलत मार्ग चुन लिया। चुनाव दर चुनाव, कांग्रेस उन्हें बरगलाती रही कि उनका उससे बड़ा खैरख्वाह कोई नहीं, केवल वो ही एकमात्र राजनैतिक दल है जो उनके दिन संवारेगी। अफ़सोस, आज भी गरीबी जस की तस है और मुसलमान राजनैतिक दलों के मोहरे बने हुए हैं। इतना सब करके भी यदि कांग्रेस अस्तित्व में है तो क्या यह देशवासियों की सहिष्णुता नहीं है? 
सबसे आश्चर्य की बात है हिन्दुस्तान में यदि कोई गर्व से स्वयं को हिन्दू कहता है तो स्वघोषित धर्मनिरपेक्ष दल व् तथाकथित बुद्धिजीवी उसे आँखें तरेर कर सांप्रदायिक करार देते हैं। हिंदुत्व इस धरा में केवल धर्म ही नही वरन एक संस्कृति है, देश की आत्मा है, अक्षुन्न सत्य है, परन्तु कुछ लोग इसे संकीर्णता व् नकारात्मकता के चश्मे से देखते है और वैसे ही परिभाषित करते हैं। खोखले आदर्शवाद का ढोल पीटने वालों की यही जमात कहती है भारतवर्ष को हिन्दू राष्ट्र बनाने का षड्यंत्र किया जा रहा है। अजीब बात है, भारत सदैव से हिन्दू-बाहुल्य राष्ट्र रहा है परन्तु शायद ये लोग इस सत्य से अनभिज्ञ हैं और इसलिए हिन्दुओं पर प्रहार कर रहे हैं। इनकी इस मूढ़ता को भी देश के अस्सी करोड़ से ज्यादा हिन्दू तवज्जो नहीं दे रहे हैं फिर भी इन्हें यहाँ असहिष्णुता नज़र आ रही है। इन सभी को यह समझना आवश्यक है कि यह देश सदा से हिन्दुस्तान था, है और रहेगा। शायद इन्हें हिन्दुस्तान में हिन्दू शब्द भी सांप्रदायिक नज़र आता होगा। इनका बस चले तो ये हिन्दुस्तान से हिन्दू शब्द निकालने की भी मांग कर डालें।
विश्व में सबसे अधिक हिन्दू धर्मं का उपहास किया जाता है। भारत में ही हिन्दू देवी-देवताओं के नाम से अनेकों किस्से, कहानी व् चुटकुले प्रचलन में हैं। विदेशों में तो देवी-देवताओं के चित्रों को बड़े बड़े दर्जी (फैशन डिज़ाइनर) अन्तः वस्त्रों में तक उकेर देते हैं। हिन्दू इन सभी बातों की अनदेखी कर देते हैं क्योंकि उन्हें विदित है कि ऐसी हरकतें हिंदुत्व का कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं। यह सहिष्णुता, यह लचीलापन और यह उदारवाद ही हिन्दू धर्म के सनातन होने का परिचायक है। लेकिन क्या अन्य धर्म के लोग अपने पवित्र संतों, देवी-देवताओं व् ग्रंथों का अपमान बर्दाश्त कर पाएंगे? कभी नही। यहाँ तक कि इसाई व् मुसलमान बाहुल्य देश भी अपने धर्मों के साथ इस तरह का खिलवाड़ सह नहीं पाएंगे।
फिर इतना हो-हल्ला क्यों? असहिष्णुता की बातें क्यों? और यह सब भी तब घट रहा है जब भारतीय जनता पार्टी ने बहुमत की सरकार बनाई है। जिस नरेंद्र मोदी को विपक्षी दल सांप्रदायिक कहते थे, उसे जनता ने देश का प्रधानमंत्री बना दिया। अपने १८ महीने के कार्यकाल में मोदी ने धर्म छोड़कर अन्य सभी मुदों पर खुलकर बातें की। यह मोदी ही है जिन्होंने मुसलमानों को धर्म के आधार पर नही बल्कि देश के नागरिक होने के नाते सुविधा देने की बात कही, समानता की पैरवी की और विकास पर बल दिया।
धर्मनिरपेक्षता की आड़ में जनता को धोखा देने वाले राजनैतिक दल मोदी के इस स्वरुप से भयभीत हैं। मोदी जनता से सीधे संवाद स्थापित कर रहे हैं। उनकी जनता से नजदीकी विपक्षी दलों को नागवार गुजर रही है। विरोधियों को यह समझना आवश्यक है कि मोदी कोई चमत्कारी पुरुष नही हैं। जनता उन्हें व् उनके कार्यों को तौल रही है। यदि वे जनता की कसौटी में खरे नही उतरे तो भविष्य में उन्हें भी नकार दिया जायेगा।
परन्तु विरोधी कसमसा रहे हैं। उन्हें डर है कि यदि मोदी कामयाब हुए तो उनकी सत्ता वापसी की राह कठिन हो जाएगी। शायद यही कारण है कि सत्ताधारी दल के कुछ बड़बोले सांसदों की बातों को विपक्षी ज्यादा ही तूल दे रहे हैं और देश में माहौल खराब होने की बात कर रहे हैं।
दरअसल असहनशील समाज नहीं, राजनैतिक दल हैं। निम्न वर्ग तो रोजी-रोटी कमाने में पिस रहा है। मध्यम वर्ग सम्पन्नता का दिखावा करने के लिए उधारी के मायाजाल में फंसा हुआ है। उच्च वर्ग समय की कमी से जूझ रहा है। इस वर्ग के लिए धन सर्वस्व है, चरित्र गौण। इन तीनों वर्गों में असहिष्णुता का ज़हर राजनैतिक दल घोलते हैं। समाज में लोभ, विद्वेष व् असुरक्षा की भावना का ऐसा संचार किया जा रहा है जिसमे जनसामान्य उलझा हुआ है और अवसरवादी अट्टहास कर रहे हैं


Monday, November 16, 2015

हंसा तो मोती चुगे: जीत, हार और अहंकार


योगेश मिश्रा

नवम्बर १६, २०१५ 
क्या जनता का भाजपा से मोहभंग हो गया है? डेढ़ साल में यह दल अर्श से फर्श तक पहुँच गया है। वैसे होने को तो इस दौरान बहुत कुछ हुआ है, परन्तु न तो नरेंद्र मोदी द्वारा विकास के नाम पर उठाए गए क़दमों का असर धरातल दिखा और न ही अमित शाह भाजपा संगठन में कोई उल्लेखनीय भूमिका निभा पाए। इक्कीसवीं सदी में भारत में रामराज्य स्थापित करने की भाजपा की परिकल्पना को साकार करने के लिए आगे आये मोदी-शाह की जोड़ी के लिए बिहार का परिणाम यक़ीनन एक सबक है, क्योंकि बहुमत की सरकार का जनाधार खिसकने लगा है और इन दोनों को आने वाले तीन वर्षों में फिर से उतना ही जोर लगाना पड़ेगा जितना उन्होंने २०१४ में आम चुनाव जीतने के लिए लगाया था।

वैसे किसी भी सरकार पर उसके पांच वर्ष का कार्यकाल पूर्ण करने से पूर्व टीका-टिपण्णी करना अनुचित है परन्तु मोदी जैसे सधे हुए राजनेता यह भलीभांति जानते थे कि सत्ता में काबिज होने के प्रथम दिन से ही वे विश्लेषकों व् आलोचकों के पसंदीदा विषय बनने वाले हैं, इसलिए उन्होंने पूरी तैयारी के साथ अपना कामकाज संभाला। उनकी विकासपरक व् राष्ट्रव्यापी बातों को लोगों ने हाथों हाथ लिया। उनके मन की बात तो जैसे लोगों को अपने मन की बात लगने लगी। बदलाव दिखने भी लगा। स्वच्छता जैसी मुहीम लोगों को जंच गई। और जो नहीं जंची वो थी उनकी महत्वपूर्ण विषयों पर चुप्पी और प्रधानमंत्री होते हुए भी साधारण नेता की तरह विरोधियों पर अनवरत कटाक्ष करने की आदत।

जब-जब जनता ने मोदी की तरफ इस आस से निहारा कि वे संवेदनशील मुद्दों, जैसे साम्प्रदायिकता, पर अपनी बेबाक राय रखेंगे, उन्होंने लम्बी चुप्पी साध ली। और जब-जब उनसे यह अपेक्षा की गई कि वे एक सुलझे हुए राजा कि तरह पेश आएंगे, वे असंयमित नज़र आये।

लोक सभा चुनाव के पहले हालात अलग थे। जब उनके निशाने पर सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, राबर्ट वाड्रा, नितीश कुमार, लालू प्रसाद, अरविन्द केजरीवाल व् अन्य होते थे तो जनता तालियाँ बजाती थी परन्तु अब न केवल दृश्य बदल गया है बल्कि उनका किरदार भी। अब जनता की वाहवाही उन्हें तभी मिलेगी जब उनके विकास का अदृश्य रथ शान्ति व् समृद्धि लायेगा। 
  
अफ़सोस, मोदी ने बिहार चुनाव में अपने भाषणों में विकासवाद की जगह व्यक्तिवाद को तरजीह  दिया। लोग चाहते थे वे बोलें तो महंगाई पर, दाल पर, प्याज पर, साम्प्रदायिकता व् असहिष्णुता की कृत्रिमता पर, काले धन पर, लेकिन उन्होंने समय बरबाद किया नितीश, लालू व् अन्य को कोसने में। जंगलराज की बात कही, परन्तु उन्होंने यह नहीं बताया कि बिहार से भाजपा के कितने सांसद अपने गोद लिए गाँवों में पिछले डेढ़ सालों में तब्दीलियाँ लाने में सफल हुए। सवा लाख करोड़ की विशेष सहायता देने की घोषणा तो कर दी परन्तु यह नहीं बताया कि बिहार के पिछड़े इलाकों में सड़क, पानी, बिजली, शिक्षा व् स्वास्थय कैसे पहुंचाएंगे, नक्सलवाद का खात्मा कैसे करेंगे। ऐसी ही व्यक्तिवादी बातें उन्होंने दिल्ली चुनाव में कहीं और प्रारंभ से अंत तक उनके निशाने में रहे केजरीवाल और अंतत: भाजपा को मुंह की खानी पड़ी।

अब बात अमित शाह की। देश के चौथे स्तम्भ ने शाह को २०१४ के आम चुनाव में भाजपा की जीत के बाद चाणक्य की उपाधि दे डाली कारण था उनका उत्तर प्रदेश में प्रतिकूल परिस्थिति में चुनाव संचालन कर भाजपा को ८० में से ७१ सीट दिलाना इस बढ़त ने मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री से भारतवर्ष का प्रधानमंत्री बना दिया समय इनाम का था। शाह को भाजपा की कमान मिल गई। शुरूआती दौर में शाह ने ऐसे तेवर दिखाए जैसे बिना चुनाव के देश के सभी राज्यों में भाजपा की सरकार बनवा देंगे परन्तु उनके सीमित कार्यकाल में ही संगठन में असंतोष के नए स्वर फूटने लगे। जिन वरिष्ठजनों को सरकार में जगह नहीं मिली, उन्हें संगठन ने भी नकार दिया।

शाह यदि चाहते तो वरिष्ठ नेताओं के अनुभव का इस्तेमाल संगठन की जड़ों को मजबूत करने के लिए कर सकते थे परन्तु उन्होंने शक्ति का नया पर्याय ढूंढ निकाला – संख्या। पुराने चेहरों दरकिनार कर अब वे भाजपा को विश्व का सबसे बड़ा दल बनाने के लिए जुट गए। लक्ष्य था १० करोड़ सदस्य बनाना। यह लक्ष्य कैसे पूरा हुआ, सब जानते हैं। शायद इसी संख्याबल के सहारे मोदी व् शाह पुरे देश में भाजपा का वर्चस्व स्थापित करना चाहते थे किन्तु बिहार चुनाव के परिणाम से यह साफ हो गया कि अति-आत्मविश्वास के चलते भाजपा ने जनमानस की मनःस्थिति पढने का प्रयास ही नहीं किया।

बिहार चुनाव में शाह की पूर्व में अपनाई गई अचूक नीतियां नज़र नही आईं तमाम तैयारियां केवल भीड़ जुटाने तक ही सीमित दिखीं। कार्यकर्ताओं में आपसी सामंजस्य की कमी दिखी। जनता से जुड़ने की कोई जहमत उठाते नहीं दिखा। सभी ऐसे आश्वस्त दिख रहे थे जैसे मोदी चंद भाषणों में ही बिहार जीत जायेंगे। शाह स्वयं विवादास्पद भाषणों को तरजीह देते दिखे।  

संगठन स्तर पर भी वे दल के नेताओं व् सांसदों को अनावश्यक बयानबाजी करने से रोकने में असफल रहे। बिहार चुनाव में शत्रुहन सिन्हा ही नहीं बल्कि अनेक नेताओं की अनदेखी की गई। कुछ चुप रह गए तो कुछ ने दल को शर्मिंदा करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखा

बिहार में लालू व् नितीश ने विकास की चाशनी में जाति, धर्म व् आरक्षण जैसे मुद्दों को लपेट दिया। मोदी व् शाह इसका तोड़ नहीं निकाल पाए। शाह ने उत्तर प्रदेश में जिस मन्त्र के तहत हर संसदीय क्षेत्र के लिए प्रत्याशी चयन से लेकर चुनाव प्रचार की रणनीति बनाई, वैसी सूक्ष्मता बिहार में  नहीं दिखी


सफलता अहंकार को जन्म देती है और यह व्यक्ति-विशेष पर निर्भर करता है कि ऐसे हालात में वह स्वयं के मन-मष्तिष्क को कितना नियंत्रित कर सकता है भाजपा इस बीमारी से अछूती नहीं है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है सन २०१४ के चुनाव परिणाम के बाद उसके नेताओं व् कार्यकर्ताओं के बदले हुए सुर। धरातल पर तो जैसे किसी के पैर ही नहीं टिक रहे थे। मोदी ने जैसे ही कहा कि अगले दस सालों तक वे केंद्र में जमे रहेंगे, भाजपाइयों को लगने लगा अब उन्हें कुछ करने की आवश्यकता नहीं। मोदी के प्रयासों को सबसे पहली चोट उनके अपने दल के नेता ही पहुंचाएंगे। यदि कुछ करके वे पांच सालों में जनता का विश्वास फिर जीतने में कामयाब भी हो जाते हैं तो भाजपाई बिना कर्म किये चमत्कार की अपेक्षा में चादर तान के सोये हुए उनकी मुसीबतें बढ़ा सकते हैं। उम्मीद है बिहार चुनाव के परिणाम भाजपाइयों को अगले तीन साल सोने नहीं देंगे।   

Thursday, November 12, 2015

Will Modi bounce back?


Yogesh Mishra

Raipur, November 12

Are people disillusioned with Bharatiya Janata Party? In just one and a half year of its rule under NDA umbrella at Centre, the party has dramatically reached to nadir from zenith. Though many things happened during this period, the steps taken by Narendra Modi on developmental plank failed to transform at practical footing. Bihar debacle is certainly a big lesson for Narendra Modi-Amit Shah combine, which was touted by the party last year to establish 21st century’s Ramrajya in the country, because the government of majority is suddenly struggling to win public mandate in states. If the conditions prevail, Modi and Shah would have to put similar effort as they did last year to win 2019 general elections.

Of course, it is unjust to expect changes happening in such a short span of time. At least, a government should complete its five-year tenure before being assessed on various parameters. Nevertheless, 18 months are enough for sprouts of hopes to come out. In fact, Modi too was aware that, he being a seasoned leader, would be favorite subject for critics and analysts from Day One of his new avatar as a Prime Minister. Hence, he assumed the office with full preparations to counter criticisms with work instead of speech.

Soon he succeeded in convincing masses that his developmental and nationalistic agendas were not mere dream-talks, but silhouette of well-conceived strategic vision. He started Mann Ki Baat via radio to directly connect to people and the latter thought he was giving voice to their feelings.

Some changes also appeared. The people liked Swchcha Bharat Abhiyaan as well as host of other initiatives. However, what they didn’t like is Modi’s silence on important issues and unnecessary exaggerations on trivial matters. They also didn’t like Modi’s sarcasm against his opponents as they felt he should maintain the dignity of PM post and talk on issues and causes instead of individuals.

Whenever, the people looked at Modi to express his candid opinions on issues like communalism, he remained tightlipped. Contrarily, whenever he was expected to behave with the wisdom of hindsight, he looked wayward.

The conditions before general elections were different. At that time, when he was targeting Sonia Gandhi, Rahul Gandhi, Robert Vadra, Nitish Kumar, Lalu Prasad Yadav, Arvind Kejriwal and others, the people would applaud him, but now, not only the scene has changed, but also his role. Now, he will only get appreciation when his invisible chariot of development would bring peace and prosperity in the country.

Unfortunately, Modi’s speeches during the hustings in Bihar were concentrated on individuals instead of development. The people wanted him to speak on skyrocketing prices of dal and onions, on artificial clouds of communalism and intolerance in the country, black money, etc but he rather embroiled in game of allegations and counter-allegations keeping Nitish and Lalu at focal point.

While attacking his opponents, he said the BJP would rid Biharis from the jungleraj, but he failed to tell what turnaround his party’s MPs from the State brought in the villages adopted by them under Sasnsad Adarsh gram Yojana in one year. 

Though he had announced Rs 125 crore-special package for Bihar earlier, he could not tell how the State’s remote areas would get road, water, electricity, health and education facility and how his party would uproot Maoism.

Modi’s development agenda derailed in Bihar when he had questioned on Nitish Kumar’s DNA in a public rally. In fact, by doing so, he had inadvertently scripted the BJP’s loss by attacking old partner Kumar who had ruled the State for eight with his party. After Lalu-Rabri era, it was the BJP-JD(U) government led by Kumar that brought perceptible reforms in Bihar. The people apparently didn’t like Modi’s remarks against Kumar.

The BJP’s Bihar drubbing can also be seen as repetition of history as Modi committed similar mistake during Delhi assembly elections earlier this year when he had openly waged war of words against Arvind Kejriwal and tried to portray the latter as a nondescript and inapt for politics instead of sticking to his development agenda. The result was historical as Kejriwal-led Aam Aadmi Party posted landslide victory in Delhi by winning 67 out of 70 seats in Delhi and BJP shrinking to mere three.   

Tuesday, November 10, 2015

BJP’s RS arithmetic fails in Bihar

Raipur, November 10

Bihar results have severely affected Bharatiya Janata Party’s hopes to consolidate its position in Rajya Sabha. The party was expecting to improve its RS tally by four next year by posting victory in Bihar assembly polls. Had the people given mandate to Narendra Modi, the BJP-led National Democratic Alliance would have sent at least ten MPs in RS by 2019.
There are 16 MPs from Bihar in the RS. The Janata Dal’s (United) share is 12 and BJP has four. Next year, JD(U)’s five MPs are completing their tenure on July 7. These MPs are Sharad Yadav, KC Tyagi, Pavan Varma, RP Singh and Gulam Rasool Balyavi.  
Six MPs including two of BJP and four of JD(U) will complete their tenure on April 2, 2018. The two BJP MPs are Ravishankar Prasad and Dharmendra Prasad. Both are union ministers at present. The four MPs from JD(U) are Vashishth Narayan Singh, Anil Sahni, Ali Anwar and Mahendra Prasad.
The tenure of rest five MPs including two of BJP and three of JD(U) will complete in April 2020. The BJP MPs are CP Thakur and RK Sinha while those from JD(U) are Ramnath Thakur, Harivansh and Kahkashan Parveen.
Presently, there are 244 MPs in the RS. One seat from Odisha is vacant. The NDA has 67 seats of which 48 belong to BJP while the Congress-led United Progressive Alliance has 78 MPs. There are 89 MPs who neither belong to NDA nor UPA. Ten MPs are nominated in the House.
The BJP knows significance of majority in the Upper House. The party has posted landslide victory in 2014 general elections, however a slew of its important decisions are pending in the RS because it has insufficient strength. In fact, it was this reason the party has to depend on others for support.

What will be the seat arithmetic now?

Bihar has 243 assembly seats. Next year, five RS seats of its quota will vacate. When polls will be conducted for these five RS seats, there will be approximately 49 voters behind every seat. In this scenario, the Mahagathbandhan (Grand Alliance) comprising JD(U), RJD, Congress and small parties will easily win three seats and will also manage to win the fourth one by horse-trading.
In this number game, the BJP can also win one seat which means a new face from saffron regime will reach RS next year. However, when six RS seats from Bihar quota will vacate in 2018, the BJP will have to incur loss of one seat because at that time, its MPs will complete their tenure. 

Monday, November 9, 2015

Ban on bursting crackers after 10 pm on Diwali


Raipur, November 09

Chhattisgarh government has banned bursting of crackers after 10 pm on Diwali. The ban came in wake of Supreme Court order to Chhattisgarh Environment Conservation Board to strictly implement the guidelines regarding the bursting of crackers during festival of lights. The board has issued circular to district collectors and SPs of all 27 districts to ensure that the people comply with the SC order and may not burst crackers 10 pm to 6 am.
According to the circular, the crackers which produce more than 125 decibel (DB) sound will be banned across the State. It says the crackers should not be burst near hospitals, educational institutions, courts, religious places and other sensitive places. It also urges to create awareness among students about noise and air pollution being caused by bursting of crackers.
The CECB officials told that the board too was concerned about rising pollution level in the State during festival seasons, especially Diwali.
“Let the people enjoy festivals following all traditions and norms, but not at the cost of environment. We want to create sense of responsibility in them. It’s every individual’s duty to conserve the environment. Knowing that the students are best messengers of such noble causes, the SC wants the board to create awareness among the school and college students regarding pollution,” said a top CECB official.
The board has appealed people to burst minimum quantity of crackers. Pointing towards health hazards related crackers, it says Sulphur Dioxide and Nitrogen Dioxide gases are released in the atmosphere to a highly dangerous level with bursting of crackers.
“The polluted air creates a lot of health problems for patients suffering from asthma, bronchitis and other respiratory diseases. Higher sound levels create irritation, sleeplessness and temporary madness. It has a negative impact on senior citizens, small children and pregnant women,” the official said.

Saturday, November 7, 2015

Minister files Rs 1 cr defamation suit against PCC chief

Raipur, November 07

Panchayat and Rural Development Minister Ajay Chandrakar has filed Rs one crore-defamation suit against Chhattisgarh Congress president Bhupesh Baghel for attempting to sully his image in public. In response, Baghel clarified that he had not received any such notice from the court and would certainly reply if he would get any. The court has fixed November 18, 2015 as first hearing date of the matter.
Lawyers Sharad Mishra and Umakant Mishra have filed the suit on Chandrakar’s behalf in the court of chief judicial magistrate Ashish Pathak in Raipur. The duo accused Baghel of deliberately indulging in the act of Chandrakar’s character assassination by making derogatory remarks against him in the public.
The lawyers demanded stern action against Baghel by quoting his controversial statement published in a local Hindi daily recently. Baghel’s comments came in wake of sacking of a female member of the Institute of Rural Development Dr Manjeet Kaur Bal after she pointed fingers towards Chandrakar for misbehaving and sexually harassing trainee women officers of the department.
The lawyers have pointed that Baghel had used the derogatory language against their client while addressing in an event organised by NSUI in Rajnandgaon. In his address, hinting on Bal’s episode, Baghel had reportedly cautioned females to stay away from Chandrakar in public or private events.
Strangely, Chandrakar didn’t react when Bal sought registration of FIR against him by submitting a complaint letter to the police. Considering sensitivity of the episode, both the Raman Singh government as well as the BJP organisation decided to pose silence instead of clarifying their stance on it.
The Congress has been targeting the saffron government on women-safety issues for long. A host of issues including botched-up sterlisation and forcible hysterectomy have already put the government on defensive. Now, with the minister himself facing charges of sexual harassment by a female officer of his department, the State is more likely to face political turbulence in coming days. 

Friday, November 6, 2015

34 pc rise in e-return filing


Raipur, November 06

While Centre is still formulating plans to check the practice of tax evasion, the simplified procedure of e-return filing is gradually proving as boon with more number of taxpayers accruing to the list of responsible citizens. In last one year, India has witnessed 34 percent rise in e-return filing, a trend, which if prevails and permeates to all sections of society, can fetch huge amount of revenue in the Central exchequer.  
According to e-return filing figures issued by Income Tax department a total of 27126345 (or 2.71 crore approximately) citizens had filed their annual returns till October 31, 2015. The e-return filing figures till October 31 last year was 20190297 (or 2.01 crore approximately).
Chhattisgarh has also witnessed marked rise in e-return filing trend. About 293260 citizens filed their annual returns this year till October 31 while the figures during same period in 2014 and 2013 were 203234 and 187616. In 2012, the figure till March was 232414.
The higher income grade people have also picked e-return filing trend and this year over 93000 citizens, with income of over Rs one crore annually, filed their returns. This figure is nearly 34000 more than the previous year.
Similarly, small earners too looked avid in filing e-returns. Among those falling within bracket of Rs 5 lakh income annually, over 2.01 crore filed their returns this year. The figure is 54.54 lakh more than last year. In Rs 5-20 lakh annual earning bracket, about 61.66 lakh have filed their returns, almost 12.50 lakh more than year 2014.
Among those earning Rs 20-50 lakh annually, about 5.90 lakh have filed returns this time. The figure of taxpayers in this grade is 144784 more than that of previous fiscal. Among Rs 50 lakh to Rs one crore annual income holders, 135277 filed returns while in the year 2014 the figure was 93102.

Thursday, November 5, 2015

CG aims to make inroads in defence sector

Raipur, November 05

That the paradigm shift in its new industrial policy has already evoked massive response nationally with new vistas of opportunity opening for investors in non-core sector, Chhattisgarh now aims to emerge as a defence manufacturing hub of the country. The State has already taken first step, though small one, in June this year by signing memorandum of understanding with ACSG Corp to establish assembly and analysis facility unit for unmanned aerial vehicle drones.
Commerce and Industry Minister Amar Agrawal says this is the right time for defence manufacturers to invest in the State as its Industrial Policy 2014-2019 has all that what they wish to have to start their business.
According to World Bank, Chhattisgarh is fourth in the country in ease of doing business and follows Gujarat, Andhra Pradesh and Jharkhand. It was the single-window clearance policy commenced by Raman Singh’s think tank while introducing Industrial Policy 2014-2019 that prompted some of the top multinational IT firms to search grounds of development in this part of the world.
The State already has shut doors for fresh investments in core sector – that it – steel, cement and power with manufacturing units in this sector reaching super-saturation mark. Conservation of environment is another major factor due to which the government has shifted focus from core sector to non-core sector. Now it is beckoning environment-friendly units, and in doing so succeeded in attracting IT and electronic firms which showed keen interest in investing in Naya Raipur.
However, for defence manufacturing units, the government is likely to provide lands in the districts adjoining to Raipur, especially in Durg, Bilaspur, etc.
With the country having set a target of achieving 75 percent indigenisation in defence production between 2020 and 2025 and spending over $150 billion over the next five years on defence procurements, it is said to be an excellent opportunity for defence-related manufacturing industries. This means that the local industry doubles in size and 120000 new jobs are created. Also, numerous offsets in the three wings of the armed forces are expected to be executed in the next five years.
According to Rear Admiral AK Verma (Retd), who was in Raipur, the Centre is likely to bring key changes in the offset policy in the defence sector under which a company will have the option of migrating from the offset obligations to Buy and Make. The much-awaited changes to the Defence Procurement Procedures (DPP-2013) are expected in the coming months with the release of DPP-2015, he said by adding that with the Make in India campaign gaining momentum, domestic as well as overseas companies would collaborate to manufacture products in India. He hoped such changes would help states like Chhattisgarh to push up their stake in defence manufacturing sector.
With nearly $100 billion worth of defence capital acquisition in the pipeline in the next one decade, Eastern Region as a whole and Chhattisgarh in particular are in a position to reap dividends. About 48 ships and submarines are under construction in various Indian public and private sector shipyards and estimates show that the Indian Air Force will have more than 1000 fighter jets and around 60 squadrons by 2030.  Therefore, there is vast opportunity for the defence manufacturers to increase their business.

Wednesday, November 4, 2015

Police refuse to file FIR against minister

Raipur, November 04

Justice delayed is justice denied. Former member of the Institute of Rural Development in Chhattisgarh Dr Manjeet Kaur Bal is still running from pillar to post for justice after she was sacked in the aftermath of her complaint to senior officers against Panchayat and Rural Development Minister Ajay Chandrakar’s disrespectful behaviour with trainee women officers in the department. After knocking the doors of Chief Minister, Governor and Prime Minister in search of justice, Bal, on Wednesday, reached Rakhi police station in Naya Raipur seeking registration of FIR against Chandrakar. However, when the cops, too, refused to entertain her, she assertively said she won’t hesitate in moving court against the minister in case of no option left.
On Wednesday, the cops including Station House Office Jeetendra Tamrakar were nervous lot when Bal requested them to file FIR against Chandrakar and retired deputy director Bhawani Shankar Tiwari of Panchayat and Rural Development department for continuously insulting and harassing her.
She handed over a complaint letter seeking FIR against the minister to the SHO but the latter reportedly expressed his inability to do so. The SHO was so frightened that he immediately called upon CSP Mukesh Khare who said no criminal charges could be framed against the minister merely on Bal’s complaint. Bal, thereafter, met SP BN Meena who assured of taking action after conducting probe on her complaint.
Bal, who was also the chairperson of the committee against women harassment at IRD, in her letter to the police wrote that she was working in the IRD for last four years but she was abruptly terminated when she complained to her bosses against Chandrakar for sexually harassing nine trainee female officers at his residence.
She pointed that her appointment was invalidated by the minister on grounds of ineligibility without conducting inquiry. She said the minister harassed her socially and financially and expressed apprehensions that he would continue to do so in future too because he was in power.
She accused that she was targeted by the minister for being a woman while two more members of the IRD – LK Sharma and Ajay Gurudiwan were continuously given service extensions despite their appointments being done through fake procedures. She said the two did not even submit required certificates for the posts they were holding.
She said despite her courageous move to expose the minister’s conspiracy against her, the State government did not take any cognisance. She apprehends that Chandrakar could cause harm to her and her family members and would let no stone unturned in mentally torturing and defaming her.
Meanwhile, Chandrakar is pleading innocent since the beginning of the episode. He also refuses to identify the complainants from Bal to the trainee officers. Ironically, the notesheet that mentions order against Bal’s termination carries Chandrakar’s signature, a rare practice as it could have been done by some senior officer too and the minister’s involvement was not needed. 

Wednesday, October 14, 2015

हंसा तो मोती चुगे: साहित्यकारों का विरोध

October 14, 2015

भारत में ज्ञान विपरीत दिशा से प्रवाहित होने लगा है। कल तक जो लेखक और साहित्यकार समाज के मार्गदर्शक कहलाते थे, अब वे नेताओं के गुण-धर्म अपनाने लगे हैं। हाल ही में कुछ लेखकों पर हुए हमले और दादरी हत्याकांड से ये संवेदनशील ज्ञान के पुंज इतने व्यथित हो गए कि विरोधस्वरुप अपना सम्मान, जिसमे साहित्य अकादमी पुरस्कार भी शामिल है, लौटाने लगे हैं। वर्तमान राजनैतिक परस्थिति से खिन्न इनमें से अधिकांश लेखक उम्रदराज हैं। आश्चर्य है, बीते छह दशकों में अनेकों हृदयविदारक घटनाएँ हुईं परन्तु एक भी घटना इनकी आत्मा को झकझोर नहीं पाई। छद्म वेश में दोगलों की यह कौन सी जमात है जो विरोध की आड़ में अपना उल्लू सीधा करने के फेर में है?

यह सत्य है कि विरोध भी अभिव्यक्ति का एक हिस्सा है और लोकतंत्र में लोग अपनी असहमति प्रकट करने के लिए भांति-भांति तरीके अपनाते हैं परन्तु यहाँ विरोध करने वाले लोग प्रबुद्ध वर्ग से हैं, कलमकार हैं, उनकी यह क्षुद्र प्रतिक्रिया अनपेक्षित है

खोखले आदर्शवाद का प्रदर्शन काम न आयेगा, अलख जलाने के लिए कलम उठाना ही पड़ेगा। शांति और सौहार्द्र का वातावरण निर्मित करने के लिए, समाज को सजग करने के लिए और अपने अधिकार की लड़ाई लड़ने के लिए कलम से बड़ा कोई हथियार नहीं।

सम्मान वापस करना यह साफ़ इंगित करता है कि इन तथाकथित साहित्यकारों की कलम में अब वो पैनापन नहीं रहा जिसके बूते वे एक समय आम जनजीवन के मन-मष्तिष्क को प्रभावित करने मे सक्षम थे। यदि ऐसा है तो साहित्य जगत के लिए यह त्रासदी का विषय है।

दरअसल गंभीर लेखन का सामाजिक व् वैश्विक जागरूकता से नाता शनैः शनैः टूटता जा रहा है। लेखक अब विचार व् चिंतन को दरकिनार कर अपने बाज़ार मूल्य को बढाने वाली सामग्री को शब्दों का अमलीजामा देने में लगे हैं। यह ऐसा दौर है जिसमे मूर्धन्य साहित्यकारों के पनपने की गुंजाइश कम है। अवसरवादिता हावी है। गुमनामी का भय इतना है कि ख़बरों में बने रहने के लिए चंद लेखक कुछ भी करने के लिए तैयार हैं – वर्तमान में उभरा विरोध का स्वर इसका ताजा उदाहरण है।

Friday, September 18, 2015

हंसा तो मोती चुगे: भाषाई राजनीति से उबरना ज़रूरी है

Yogesh Mishra

September 18, 2015

महाराष्ट्र सरकार का गैर-मराठी भाषी ऑटो रिक्शा वालों के लिए नया फरमान हास्यास्पद है। सरकार उन्हें मराठी सीखने के लिए बाध्य कर रही है। अरे, सीखना ही है तो वे कुछ और सीखेंगे जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो, मराठी ही क्यों? या फिर सरकार ने मराठी भाषा को नरेन्द्र मोदी के कौशल उन्नयन कार्यक्रम मे शामिल कर लिया है?

अजीब मज़ाक चल रहा है। अब सरकारें हर कदम राजनैतिक मकसद के लिए ही लेने लगी हैं। विश्लेषक कहते हैं यह शिवसेना का नया पैंतरा है अपनी जड़ें मजबूत करने का। 21वीं सदी का भारत अब तक क्षेत्रवाद की गंदी राजनीति से उबर नही पाया है। महाराष्ट्र सरकार का यह फरमान आज़ाद भारत की खोखली एकता का नायाब नमूना प्रतीत होता है।

दरअसल यह क्षेत्रवाद ही था जिसने भारतवर्ष को सैकड़ों वर्षों तक खंडित रखा, विभाजित रखा और इसका लाभ मुगल और अँग्रेज़ों ने भरपूर उठाया। दुख की बात है कि अब भी भाषाई दीवारें खड़ी कर क्षेत्रवादी कूपमंडूक राजनैतिक दल अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। यह सिलसिला अब समाप्त होना चाहिए।

हिन्दी भाषा का ज्ञान पर्याप्त है आजीविका चलाने के लिए। परंतु यह आश्चर्य की बात है कि देश की मातृभाषा होने के बावजूद हिन्दी अनेक प्रांतों मे अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है। यह वर्षों से हो रहा है। यह कोई नई बात नही है। और हम सदैव गर्व से कहते रहे हैं - हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दुस्तान हमारा। वाह! और हम मे शामिल कौन-कौन हैं? वे सभी राजनैतिक दल जो साल मे एक दिन हिन्दी दिवस धूमधाम से मनाते हैं परंतु बाकी 364 दिन हिन्दी की व्यापक स्वीकार्यता के लिए कुछ भी नही करते।

भाषा केवल एक-दूसरे को बेहतर तरीके से समझने का माध्यम है। इसे व्यर्थ क्षेत्र, धर्म व वर्ग की अस्मिता से जोड़कर राजनीतिक रंग देना केवल फूहड़ मानसिकता का परिचायक है।

Monday, July 27, 2015

हंसा तो मोती चुगे: बिहार मे विकास से ज़्यादा नीतीश को तरजीह क्यों?


Raipur, July 27, 2015

नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने दिल्ली चुनाव मे विकास के बजाए अरविंद केजरीवाल की बातें की और परिणाम भाजपा के विपरीत गया। अब बिहार मे भी मोदी कुछ इसी तरह का सुर अपना रहे हैं। नीतीश कुमार की आलोचना करके बिहार की जनता के हृदय मे स्थान बनाना कठिन कार्य है।

नीतीश कितने भी अवसरवादी राजनेता हों, परंतु उनके द्वारा बिहार मे किए गए कार्यों को अनदेखा नही किया जा सकता। नीतीश कोई सोनिया अथवा राहुल नही हैं जिनके बारे मे जनता मज़ाक बर्दाश्त करेगी। बिहार की जनता को चाहिए विकल्प और वो भी इतना मजबूत जो नीतीश को टक्कर दे सके।

भाजपा मे नेताओं की भरमार है। बिहार से तो एक से बढ़कर एक धुरंधर नेता हैं। समय चयन का है। मोदी को चेहरा बनाकर विधान सभा चुनाव लड़ना बचकाना है। दिल्ली की तर्ज पर ऐन वक्त मे किरण बेदी जैसे मुख्यमंत्री प्रत्याशी को उतरना भी ठीक नही है। जनता पचा नही पाएगी।

अनंत कुमार को बिहार का चुनावी प्रभार दिया जाना भी समझ से परे है। दिल्ली की हार के बाद अमित शाह के पास अवसर था कि वे बिहार मे अपनी प्रतिभा दिखाते और सिद्ध करते कि उनकी उत्तर प्रदेश की रणनीति कोई हवा-हवाई सोच का परिणाम नही थी वरन एक ठोस व धरातल मे किए गये कार्य का प्रतिफल थी।

एक सोच यह उभरती है कि अमित शाह राष्ट्रीय अध्यक्ष होकर प्रदेश चुनाव की कमान क्यों संभालेंगे? दूसरी सोच यह है कि जब चुनौती छोटी अथवा बड़ी नही होती तो अमित शाह क्या इस बात से डर रहे हैं क़ि बिहार के परिणाम यदि दिल्ली जैसे आए तो दल मे अन्य नेता उनसे इस्तीफ़ा माँगना प्रारंभ कर देंगे?

कारण जो भी हो, मोदी और शाह की जोड़ी बिहार मे तभी सफलता के परचम लहराएगी जब वे दोनों अपनी-अपनी प्रतिभा का भरपूर दोहन करेंगे और जीत के लिए पूरी ताक़त झोंक देंगे..

Sunday, April 5, 2015

Social equality? My foot!! No girl is safe in the country..


Yogesh Mishra
This is bizarre!! Why on earth defending lawyers of Fabindia are giving pretexts that the camera was installed outside the trial room? What do they mean? Nothing wrong has happened?
Boy!! Nobody knows, for how long the game of recording females changing clothes in Fabindia trial room was going on and here, the culprits are claiming innocence!!!
This is incredible!! How the hell you are innocent, you cowards? As soon as Irani spotted the camera, she called upon local the MLA Michael Lobo who himself saw at least 30 minute-recording before Irani's entry in the store and discovered that all the females who had changed clothes in the trial room during that period were caught in the camera. He confirmed that the camera had captured photographs/video clippings of the females from head to waist.
What is happening in the country? While the people are frequently circulating information pertaining to hidden cameras in the trial rooms of apparel stores, hotels, restaurants, etc, the government, instead of thwarting such clandestine activities by framing stringent law, seems not even aware of it or deliberately ignoring it.
Perhaps, therefore even Irani - the union HRD minister - was about to fall into trap inadvertently as others.
It’s really high time things should change from rules to policies to judicial proceedings. The girl gangraped in Delhi has not yet got justice. Thereafter, N number of rape cases came to fore, but how many rapists are behind the bars? Perhaps none!!
What is the government doing? It has launched several schemes for females. It wants equal participation of females in making India a global leader. Nonetheless, it fails to protect them.
The females are unsafe pan India. They are not even safe in the national capital, forget about small cities. What is the use of running all kind of female-oriented programmes when none offers them secure and dignified life?
And what are we doing as sensible citizens? We take out candle marches after every rape or molestation case. That's all. We talk much about protecting girls. We hold debates on this serious issue and even participate in awareness programmes related to it. The fact is, we simply try to draw public attention on this sensitive matter, but barely act when we are expected to do so.
Girl power!! Oh! Come on. Don't get entangled in these words. There are people who talk about Beti Bachao in the day time and fly to Bangkok to sleep with a girl in the evening. Its time to denude these hypocrites. Its time to object when somebody tease any girl. Its time to ask the apparel store manager to prove that the trial room you are using has no hidden camera. Its time to mount pressure on the government to hang the rapist (be it minor or adult). Raise voice. Merely protecting the females of your home is not enough. Protect every female. Let her breath the air of freedom..

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