Monday, September 19, 2016

छत्तीसगढ़ में एमओयू 7 लाख करोड़ का, निवेश हुआ केवल 2908 करोड़


योगेश मिश्रा
सितम्बर 19, 2016 

रायपुर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेक इन इंडिया के सपने पर भाजपा-शासित छत्तीसगढ़ ही पानी फेरता नजर आ रहा है। प्रदेश में नई सरलीकृत उद्योग नीति लागू होने के बावजूद अपेक्षानुसार परिणाम नहीं आ रहे हैं। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग के अंतर्गत जनवरी 2010 से जुलाई 2016 तक छत्तीसगढ़ में 7 लाख 9 हज़ार 316 करोड़ रुपए के 692 समझौते (एमओयू) हुए परन्तु धरातल पर निवेश हुआ केवल 2908 करोड़ रूपए का और निवेशकों की संख्या रही उन्नीस। 

देश में पिछले साढ़े छह सालों में प्रस्तावित निवेश के मामले शीर्ष पांच राज्यों में छत्तीसगढ़ दूसरे स्थान पर रहा। इस अवधि में सर्वाधिक निवेश आकर्षित किया ओडिशा ने और तीसरे, चौथे तथा पांचवे पायदानों पर गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश काबिज रहे। हालाँकि इन पांचो राज्यों में सबसे कम निवेश छत्तीसगढ़ में हुआ 

वर्ष 2014 मे प्रस्तावित निवेश के मामले मे छत्तीसगढ़ देश मे अव्वल रहा। जाहिराना तौर पर निवेशकों ने इस नए राज्य को गुजरात और महाराष्ट्र जैसे आर्थिक रूप से मजबूत राज्यों की अपेक्षा ज्यादा तरजीह दी। छत्तीसगढ़ में 37 समझौते हुए और निवेश प्रस्तावित हुआ 1 लाख 62 हज़ार 584 करोड़ रुपए का जो देश भर के कुल प्रस्तावित निवेश का 40.14 प्रतिशत था। कहा गया कि इन समझौतों से प्रदेश में 26,856 लोगों के लिए रोजगार के अवसर बनेंगे लेकिन उस वर्ष न तो कोई उद्योग लगा और न ही निवेश हुआ। 

वर्ष 2015 में 117 समझौते हुए और 36,511 करोड़ रुपए का निवेश प्रस्तावित हुआ परन्तु उस अवधि में केवल पांच उद्योगों ने 2037 करोड़ का निवेश किया। इस वर्ष (2016) प्रदेश में जनवरी से जुलाई तक 33 समझौतों के तहत 8654 करोड़ रुपए प्रस्तावित निवेश के मुकाबले सिर्फ तीन उद्योगों ने 91 करोड़ रुपए खर्च किए हैं।  



छत्तीसगढ़ में निवेश की स्थिति - जनवरी 2010 से जुलाई 2016 तक 
वर्षसमझौतेप्रस्तावित निवेश (करोड़ में)समझौते धरातल मेंनिवेश हुआ (करोड़ में)
201025628558310749
201111410226600
2012787957500
20135734143131
20143716258400
20151173651152037
2016338654391

692423733192908


प्रदेश में तीसरी बार सरकार बनाने के बाद मुख्यमंत्री रमन सिंह ने उद्योग क्षेत्र का विकास गैर कोर सेक्टर में करने का फैसला किया। दरअसल वर्ष 2013 के पहले कोर सेक्टर (स्टील, उर्जा और सीमेंट) में अंधाधुंध निवेश हुआ जिसकी वजह से न केवल प्रदेश के पर्यावरण को क्षति पहुंची बल्कि प्रदुषण की मात्र भी आसमान छूने लगी
उम्मीद थी कि प्रदेश की नयी उद्योग नीति के अंतर्गत गैर कोर सेक्टर में हुए विशाल निवेश को धरातल में लाने में कारगर साबित होंगी परन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। नयी नीति के तहत एकल खिड़की प्रणाली भी काम न आई बावजूद इसके कि छत्तीसगढ़ को विश्व बैंक ईस ऑफ़ डूइंग बिज़नस (व्यवसाय के सरलीकरण) के मामले में देश का चौथा सबसे बेहतर प्रदेश मानता है।

नीतियां बदली, नीयत नहीं

भारत में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग वर्ग के तहत निवेश प्रस्तावित करने का सिलसिला अक्टूबर 2006 से प्रारंभ हुआ। इस वर्ग में विनिर्माण क्षेत्र में प्लांट और मशीनरी पर निवेश 10 करोड़ रुपए से अधिक और सेवा क्षेत्र में  निवेश 10 करोड़ रुपए से ज्यादा होना चाहिए। 

इस वर्ग में नए उद्योगों की स्थापना और विस्तार के लिए जनवरी 2010 से जुलाई 2016 तक देश भर में 98,388 समझौतों के तहत कुल मिलाकर 1 करोड़ 10 लाख 83 हज़ार 320 रुपए का निवेश प्रस्तावित हुआ। उम्मीद की गई कि इस भारी-भरकम निवेश से 2 करोड़ 37 लाख 6 हज़ार 663 लोगों को रोजगार उपलब्ध होगा, लेकिन इस दौरान केवल दस फीसदी उद्योग ही उत्पादन प्रारंभ कर पाए जिसकी वजह से अन्य सभी लक्ष्य धरे-के-धरे रह गए।

औद्योगीकरण की धीमी गति भाजपा की एनडीए सरकार के लिए वास्तव मे शुभ संकेत नहीं है। वर्तमान में पूरा विश्व आर्थिक मंदी की चपेट में है, परन्तु यह सरकार लगातार यह स्पष्टीकरण देती रही है कि देश की अर्थव्यवस्था पर इसका लेशमात्र भी प्रभाव नहीं पड़ा है। निवेश मे तेजी लाने के लिए मोदी सरकार ने कुछ सुधारवादी कदम भी उठाए और सभी राज्यों को ईस ऑफ़ डूइंग बिज़नस (व्यवसाय के सरलीकरण) के मामले में विश्व बैंक द्वारा निर्धारित मापदंडों को लागू करने के लिए कहा।

परिणाम सकारात्मक रहा। विश्व बैंक की ईस ऑफ़ डूइंग बिज़नस की सूची में भारत ने श्रेणी सुधार करते हुए 12 पायदानों की छलांग लगाई और 142 से 130 स्थान पर आ गया। राज्यों की रैंकिंग मे भी सुधार हुआ और झारखण्ड व छत्तीसगढ़ जैसे नए राज्य तीसरे और चौथे स्थान पर पहुँच गए। पहला और दूसरा स्थान गुजरात और आन्ध्र प्रदेश का रहा जबकि मध्य प्रदेश और राजस्थान पांचवे और छटवें क्रम में रहे।

हालाँकि इतने कसरत के बाद भी निवेशकों को राज्यों मे उद्योग लगाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। यहाँ तक कि लाल-फीताशाही से मुक्त करने के लिए प्रारंभ की गई सिंगल विंडो सिस्टम (एकल खिड़की प्रणाली) भी काम न आई और निवेशक अब भी अनेक प्रकार के क्लीयरेंस के लिए भटक रहे हैं। दरअसल, राज्यों में नीतियां तो बदली हैं, परन्तु अफसरों की नीयत नहीं


भारत में निवेश की स्थिति - शीर्ष 5 राज्य – जनवरी 2010 से जुलाई 2016 तक 
क्रमांकराज्यसमझौतेप्रस्तावित निवेश (करोड़ में)समझौते धरातल मेंनिवेश हुआ (करोड़ में)
1ओडिशा463856179219828
2छत्तीसगढ़692709316192908
3गुजरात2752649332562122712
4महाराष्ट्र3568526053545106734
5मध्य प्रदेश9034386451237262

Saturday, August 13, 2016

काले सोने का सफेद सच: आदिवासियों के जीवन में अंधेरा कर देश को कर रहा रोशन

योगेश मिश्रा
August 13, 2016
रायपुर

कोयला भारत की उर्जा नीति में धुरी और अर्थव्यवथा में रीढ़ है। भारत की दो तिहाई बिजली कोयले से पैदा होती है और यह विश्व का तीसरा सबसे बड़ा कोयला उत्पादक व उपभोक्ता देश है।  गैर-परंपरागत उर्जा को बढ़ावा देने के साथ-साथ नरेंद्र मोदी की सरकार ने 2020 तक कोयले के वार्षिक उत्पादन को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। हालाँकि काले सोने से उर्जा के क्षेत्र में विकास की नई इबारत लिखने की चाहत रखने वाली केंद्र व राज्य सरकारें इसके उत्खनन से प्रभावित होने वाले लोगों से उनकी जमीन अधिग्रहित करने, जंगलों का खात्मा करने और उनकी ज़िन्दगी को खतरे में डालने से पहले उनकी राय लेने की भी जहमत नहीं उठाना चाहतीं। फलस्वरूप ऐसे लोग, जिनमें नब्बे फीसदी आदिवासी हैं और जिनके लिए विकास, नीति और कानून महज कागजों में स्याही से उकेरी गई आड़ी-तिरछी लाइनों से ज्यादा कुछ नहीं, इस असमंजस में हैं कि ऐसी स्थिति में अपने दुर्भाग्य को कोसें या सरकार को।  

देश का 70 प्रतिशत कोयला छत्तीसगढ़, झारखण्ड और ओडिशा में है। इन राज्यों में करीब 2.60 करोड़ आदिवासी (जिनकी संख्या भारत के आदिवासियों की कुल जनसँख्या का 25 प्रतिशत है) अंधाधुंध खनन से बदतर जीवन निर्वाह करने के लिए मजबूर हैं। पिछले छः दशकों में केंद्र व राज्यों में कई सरकारें आईं और गईं लेकिन विकास के संकुचित रोडमैप में इनके भाग्य को बदलने के लिए कोई नीति नहीं बनाई गई।

केंद्र सरकार की कोल इंडिया लिमिटेड, जो विश्व की सबसे बड़ी कोयला उत्पादक संस्था है, ने 2020 तक एक बिलियन टन के वार्षिक उत्पादन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए आक्रामक नीति बनाई है। इसके तहत कोल इंडिया की तीन इकाइयाँ - एसईसीएल, सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड और महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड  - छत्तीसगढ़, झारखण्ड और ओडिशा में भूमि अधिग्रहण से लेकर पर्यावरण कानूनों को धता बताकर और प्रभावित आदिवासियों को बिना भरोसे में लिए खदान विस्तार की प्रक्रिया को अंजाम दे रही हैं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल का खुलासा
एसईसीएल छत्तीसगढ़ के कुसमुंडा खदान को संचालित कर रही है जबकि सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड झारखण्ड के तेतरिखार खदान और महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड ओडिशा के बसुन्धरा-वेस्ट खदान का सञ्चालन करती हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इन क्षेत्रों में जनवरी 2014 से जून 2016 तक विस्तृत सर्वे के दौरान पाया कि भूमि अधिग्रहण के निर्णय से पहले वहां निवासरत आदिवासियों से कोई रायशुमारी नहीं की गई। बहुतों को तो मुआवजे और विस्थापन के लिए दशकों इन्तजार करना भी पड़ा। सर्वे रिपोर्ट के अनुसार दावा-आपत्ति और जनसुनवाई की सूचनाएँ प्रभावितों तक या तो नहीं पहुंची या देर से पहुंची। कम पढ़े-लिखे अथवा अनपढ़ अदिवासियों तक अख़बार के बजाए अन्य प्रभावी माध्यमों द्वारा सूचना पहुँचाने का प्रयास कभी नहीं किया गया।

नहीं मिला किसी कानून का लाभ
कोयला खनन से प्रभावितों के मुआवजे, विस्थापन और विकास के लिए चार महत्वपूर्ण कानून हैं - कोयला क्षेत्र अधिग्रहण और विकास अधिनियम 1957,  पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986, पंचायत के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम 1996 (पेसा) और वन अधिकार अधिनियम 2006। इन कानूनों से छत्तीसगढ़, झारखण्ड और ओडिशा के प्रभावित आदिवासियों को अब तक उतना लाभ नहीं मिला जितने का सरकारें  दावा करती आई हैं।

छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के पास दावे की गुंजाईश ही नहीं बची
कुसमुंडा खदान देश के सबसे बड़े खदानों में से एक है और छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में स्थित है। भूमि अधिग्रहण से प्रभावित आमगाँव के आदिवासी कहते हैं - एसईसीएल वाले अधिग्रहण का नोटिस पंचायत के दफ्तर में चिपका कर चलते बने, भला हम दावा करते भी तो कैसे? कुसमुंडा खदान 2382 हेक्टेयर में फैला हुआ है। इसका वार्षिक उत्पादन 2009 में 10 मिलियन टन से 15 मिलियन टन तक बढ़ा दिया गया। वर्ष 2014 में उत्पादन 18.75 मिलियन टन हुआ और 2016 की पहली तिमाही तक यह आंकड़ा 26

मिलियन टन हो गया।

जून 2009 में विस्तार के समय प्रभाव क्षेत्र में आने वाले पांच गाँवों (रिस्दी, सोनपुरी, पाली, पडनिया और जटरज)  के लगभग 3600 आदिवासियों को अखबार के माध्यम से भूमि अधिग्रहण की सूचना दी गई। कम पढ़े-लिखे होने की वजह से यह सूचना इन आदिवासियों के पल्ले ही नहीं पड़ी। उन्होंने कहा कि किसी को भी सूचना सीधे नहीं दी गई। अप्रैल 2014 में प्रभावितों ने बताया कि बाद में उन्हें केवल एक सूचना मिली कि एसईसीएल ने उनकी 752 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहित कर ली है।

20 जुलाई 2014 को केन्द्रीय कोयला मंत्रालय ने गजट में प्रकाशित किया कि कुसमुंडा खदान के एक और विस्तार के लिए पांच गांवों (आमगाँव, चुरैल, खोदरी, खैरबावना और गेवरा) के 1051 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया जाएगा जिससे लगभग 13,000 निवासी प्रभावित होंगे। 30 दिनों के अन्दर मुआवजे व विस्थापन के लिए दावा-आपत्ति मंगाई गई लेकिन प्रभावितों ने कहा उन्हें कोई सूचना नहीं मिली। हालाँकि कुछ ने कोयला नियंत्रक व एसईसीएल को अपनी आपत्तियां भेजीं परन्तु उसका भी कोई परिणाम नहीं निकला।

झारखण्ड में बिना पूछे ले ली गैर मजरुआ भूमि
झारखण्ड के तेतरिखार खदान के लिए पीढ़ियों से रह रहे आदिवासियों की गैर मजरुआ भूमि बिना पूछे ही अधिग्रहीत कर ली गई। नियमानुसार, गैर मजरुआ या साधारण भूमि को उत्खनन के लिए अधिग्रहीत करने से पहले स्थानीय प्रशासन से अनुमति अनिवार्य है। लेकिन, इस केंद्र ने इस नियम की अनदेखी कर आदिवासियों की करीब 40 हेक्टेयर गैर मजरुआ भूमि अधिग्रहीत कर ली जिसका अब तक कोई उपयोग नहीं किया गया है।

तेतरिखार खदान 131 हेक्टेयर में फैला हुआ है। सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड इसका वार्षिक उत्पादन 0.5 मिलियन टन से 2.5 मिलियन टन करने का लक्ष्य रखा है। भूमि अधिग्रहण से बसिया, नागारा, जाला और पिन्दार्कोम के लगभग 6400 आदिवासी प्रभावित होंगे।

ओडिशा में खदान की जमीन पर पॉवर प्लांट लगाने की तैयारी
महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड ने ओडिशा के सुंदरगढ़ में स्थित बसुन्धरा-वेस्ट खदान का वार्षिक उत्पादन 2.4 मिलियन टन से बढाकर 8 मिलियन टन करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। यह खदान 401 हेक्टेयर में फैला हुआ है। एमसीएल ने खदान के लिए सारडेगा, टिकलीपारा और कुल्हापारा में कोयला क्षेत्र अधिग्रहण और विकास अधिनियम 1957 के तहत 1989 और 1990 में 860 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहीत की थी, लेकिन अब वहां की आधी जमीन पर पॉवर प्लांट (क्षमता - 2x800 मेगावाट) स्थापित करने की  तैयारी चल रही है। स्थानीय ग्राम सभाएं इसका विरोध कर रही हैं। उनका कहना है कि खदान के लिए ली गई भूमि पॉवर प्लांट के लिए तब तक ट्रान्सफर नहीं होने देंगे जब तक एमसीएल सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार मुआवजा, विस्थापन और व्यवस्थापन की प्रक्रिया का पालन नहीं करती।

नहीं हुआ कानून का उल्लंघन

छत्तीसगढ़ के उद्योग, खनन व खनिज सचिव सुबोध सिंह का कहना है कि उनकी जानकारी में भूमि अधिग्रहण के मामले में किसी भी कानून का उल्लंघन नहीं हुआ है. उनका कहना है, "सरकार को इस सिलसिले में कभी कोई शिकायत भी नहीं मिली. छत्तीसगढ़ सरकार कोयला खदानों के लिए भूमि अधिग्रहण से पहले मुआवजा और व्यवस्थापन से सम्बद्ध सभी नियमों का परिपालन करती है. छत्तीसगढ़ तो आदर्श मुआवजा नीति अपनाते हुए भूमि अधिग्रहण के एवज में दो से चार गुना राशि प्रभावितों को देती है."

Wednesday, August 3, 2016

संसदीय समिति का प्रस्ताव, आईएफएस प्रतिभागी दें यूपीएससी में अतिरिक्त पेपर

योगेश मिश्रा
August 03, 2016
रायपुर

विदेशी मामलों के लिए बनी संसदीय समिति ने आईएफएस की नई खेपों के स्तर में लगातार होती गिरावट पर चिंता ज़ाहिर करते हुए प्रस्ताव दिया है कि विदेश सेवा में करियर बनाने के इच्छुक प्रतिभागियों के लिए यूपीएससी द्वारा आयोजित सिविल सर्विसेस परीक्षाओं में एक अतिरिक्त पेपर होना चाहिए जिससे उनका अंतर्राष्ट्रीय मामलों में ज्ञान व आवश्यक योग्यता का परिक्षण हो सके। लोक सभा में बुधवार को अपनी रिपोर्ट पेश करते हुए समिति ने अंतर्राष्ट्रीय मंच में भारत के समक्ष खड़ी चुनौतियों से निबटने के लिए राजनयिकों की संख्या को भी अपर्याप्त बताया है। भारत में 912 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 770 आईएफएस हैं, जबकि अमरीका में 20,000, जापान में 5700 और चीन में 4500 राजनयिक हैं।

समिति के अध्यक्ष कांग्रेस सांसद और पूर्व केन्द्रीय विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर का मानना है कि देश के कूटनीतिक मामलों को यदि सही हाथों में देना है तो यूपीएससी आईएफएस प्रतिभागियों के लिए एक अतिरिक्त पेपर आवश्यक कर देना चाहिए। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि आईएफएस चयन के लिए निर्धारित गुणवत्ता मानदंडों के मद्देनजर पर्सनालिटी टेस्ट का दायरा भी बढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि पर्सनालिटी टेस्ट लेने वाले साक्षात्कार मंडल अपनी टिप्पणियों में यह भी इशारा करें कि आईएफएस चुनने वाले प्रतिभागी योग्य हैं अथवा नहीं।

समिति ने आश्चर्य जताया कि अब कम रैंक वाले प्रतिभागियों को भी आईएफएस मिल जाता जाता है जबकि पहले विदेश सेवा की सभी सीटें यूपीएससी टॉपर्स ही चुन लिया करते थे। समिति ने कहा इस बदलाव से आईएफएस कैडर की प्रतिष्ठा को गहरी ठेस पहुंची है और इसलिए चयन प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन जरूरी है।

514 नए पदों का होगा सृजन

देश में राजनयिकों की सीमित संख्याबल को बढाने के लिए विदेश मंत्रालय ने दस-वर्षीय योजना बनाई है जिसके अनुसार 2008 से 2018 के दौरान 514 नए पदों का सृजन किया जाएगा। विदेशी मामलों की संसदीय समिति कहती है कि यह योजना वर्तमान में मौजूद राजनयिकों के आकार और आवश्यक संख्या के बीच उत्पन्न खाई को पाटने के लिए अपर्याप्त है क्योंकि इसके प्रतिपालन में केवल दो वर्ष शेष रह गए हैं।

वर्तमान में भारत में कुल 2700 राजनयिक हैं जिनमे 770 आईएफएस के अलावा आईएएस, आईपीएस तथा अन्य सेवाओं के साथ-साथ विभिन्न मंत्रालयों के सपोर्ट स्टाफ भी शामिल हैं।

इन देशों में हैं भारत से अधिक राजनयिक


अमरीका 20,000
जापान 5700
चीन 4500
फ्रांस 6000
ब्राज़ील 2000
दक्षिण कोरिया 1250
इटली 910
सिंगापुर 790
भारत 770

Friday, July 29, 2016

अब बड़बोले नौकरशाहों पर केंद्र कसेगी लगाम

योगेश मिश्रा
July 29, 2016
रायपुर

सार्वजानिक रूप से सरकार की आलोचना करने वाले बड़बोले नौकरशाहों पर केंद्र ने लगाम कसने की ठान ली है। अब यदि बाबुओं ने भावातिरेक में टेलीविज़न, सोशल मीडिया, कैरीकेचर या अन्य संचार माध्यमों में दायरे से बाहर जाकर सरकार के खिलाफ जहर उगला तो उन्हें कड़ी कार्रवाई झेलनी पड़ सकती है। नरेन्द्र मोदी सरकार का इशारा साफ़ है - प्रशासनिक स्तर पर कसावट लाने के लिए वह नौकरशाहों पर अनुशासन का डंडा चलाने से भी गुरेज नहीं करेगी। इस आशय से केंद्र के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने 18 जुलाई 2016 को सभी राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को पत्र प्रेषित कर 12 अगस्त 2016 तक राय मांगी है।

पिछले डेढ़ दशक में नेताओं के साथ-साथ सिविल सेवकों की भी टेलीविज़न, सोशल मीडिया और अन्य प्रसार माध्यमों में उपस्थिति बढ़ी है। कई बार ख़बरों में बने रहने के लिए इन नौकरशाहों ने अपनी सीमाएं लांघकर ऐसे-ऐसे बयान दिए कि संबंधित सरकारें भी सकते में आ गईं। दो वर्ष पहले मोदी ने प्रधानमंत्री पद सँभालते ही मंत्रियों और अफसरों को अनुशासन की घुट्टी पिलाते हुए साफ़ कर दिया था कि उनके राज में ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। हालाँकि मोदी की नसीहत के बावजूद कई मंत्री और अफसर गाहे-बगाहे गैरजिम्मेदाराना बयानबाजी करते नजर आए।

छत्तीसगढ़ में 2006 बैच के आईएएस अफसर अलेक्स पॉल मेनन सोशल मीडिया में अपनी बेबाक राय रखने की वजह से सबसे ज्यादा विवादों में रहे हैं। उनकी हैदराबाद यूनिवर्सिटी के रोहित वेमुला द्वारा आत्महत्या के मामले से लेकर जेएनयू के कन्हैया कुमार द्वारा कथित देशद्रोही नारे के मुद्दे तक सोशल मीडिया में लिखी गई विवादास्पद बातों ने  राज्य सरकार के भी होश फाख्ता कर दिए। हाल ही में उन्होंने भारतीय न्यायिक व्यवस्था पर ही प्रश्नचिन्ह लगाते हुए सोशल मीडिया में लिख दिया था कि 94 फीसदी फांसी की सजा पाने वाले लोग मुसलमान या दलित होते हैं। हाल ही में सरकार ने उनकी इस टिपण्णी पर सख्त ऐतराज करते हुए उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया है।

मेनन की तरह 2004 बैच के आईएएस अफसर अमित कटारिया भी सोशल मीडिया में सक्रीय हैं। कभी उनकी गौगल पहनकर प्रधानमंत्री मोदी से से हाथ मिलाते हुए तस्वीर सोशल मीडिया ने वायरल हो जाती है तो कभी वे बस्तर में मोटर साईकिल में तीन सवारी घूमते हुए मीडिया का ध्यान आकृष्ट कर जाते हैं।

मध्य प्रदेश में भी हाल ही में आईएएस संतोष गंगवार ने फेसबुक पर एक ऐसे लेख को लाइक कर दिया था जिसमे मोदी की आलोचना थी और पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु की तारीफ। गंगवार ने यह भी टिपण्णी की थी की क्या यह नेहरु की गलती थी कि उन्होंने हमें 1947 में हिन्दू तालिबानी राष्ट्र बनाने से बचा लिया था। मध्य प्रदेश सरकार ने गंगवार की बातों सेवा नियमों के विरुद्ध मानते हुए उन्हें बिका कारण बताए सचिवालय में अटैच कर दिया था।

दरअसल कई अवसरों पर अफसरों का बडबोलापन सरकार की नीतियों को ही कटघरे पर खड़ा कर देता है। ऐसी स्थितियों से बचने के लिए केंद्र सरकार ने हाल ही में एक समिति गठित की जिसने अखिल भारतीय सेवाएं (आचरण) नियम 1968 का अध्ययन करने के बाद डीओपीटी को चार नियमों में संशोधन करने का प्रस्ताव भेजा है। सबसे महत्वपूर्ण संशोधन नियम सात के लिए प्रस्तावित है जिसके तहत नौकरशाह विभिन्न संचार माध्यमों द्वारा सरकार की खुलेआम आलोचना नहीं कर सकेंगे। इसी प्रस्ताव को केंद्र ने सभी राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों  के मुख्य सचिवों को भेज अपनी मंशा जाहिर करने को कहा है।

Thursday, July 21, 2016

किसके लिए विकास

योगेश मिश्रा
July 21, 2016
रायपुर

बीते एक दशक में छत्तीसगढ़ ने विकास की रफ़्तार के मामले में कई प्रदेशों को पीछे छोड़ दिया, लेकिन इसका लाभ यदि यहाँ के युवाओं को नहीं मिल रहा तो फिर इसका औचित्य क्या है? प्रदेश में करीब 50 इंजीनियरिंग व सात मेडिकल कालेज हैं। इसके अलावा राष्ट्रिय स्तर के संस्थान जैसे एम्स, आईआईटी, आईआईआईटी, आईआईएम, एनआईटी, लॉ यूनिवर्सिटी आदि हैं। कौशल उन्नयन के लिए हर जिले में लाइवलीहुड कालेज है। सरकार दसियों रोजगार-मूलक कोर्स चला रही है। फिर भी यदि कोई दिव्यांग नौकरी न मिलने की वजह से कुंठित हो मुख्यमंत्री निवास के सामने आत्मदाह का प्रयास करे तो यह युवाओं के लिए बनाई गई पूरी नीति में दोष को उजागर करती है।

साधन-संसाधन से पूर्ण छत्तीसगढ़ में यदि देश-विदेश बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ कई लाख करोड़ का निवेश कर रही हैं तो स्थानीय युवाओं को रोजगार क्यों नहीं मिल रहा है? सरकार बड़े ताम-झाम के साथ निवेशकों को आमंत्रित करती है, कहती है - छत्तीसगढ़ में सब मिलेगा - सस्ती जमीन, सस्ती बिजली, भरपूर पानी और कुशल युवा। यदि यह सब सच है तो रोजगार कार्यालयों के सामने क्यों रोजाना सुबह से ही युवा लाइन लगाए खड़े रहते हैं?

युवाओं को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार केंद्र से कदम से कदम मिलाकर चल रही है। युवाओं में उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए देश-प्रदेश द्वारा दर्जनों योजनायें चलाई जा रही हैं। कम ब्याज दरों में ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है। भरोसा दिलाया जा रहा है कि आप तो बस व्यापार प्रारंभ करें, कोई समस्या नहीं आएगी, आपके प्रोजेक्ट में लालफीताशाही आड़े नहीं आएगी, समस्त कार्य सिंगल विंडो प्रणाली के तहत चुटकी में हो जायेंगे। पूरी कवायद ब्रेनड्रेन रोकने की है। लेकिन यथार्थ कुछ और है - जो युवा आईटीआई अथवा किसी कालेज से रोजगार-मूलक कोर्स कर यदि कोई व्यापार करना चाहता है तो अब भी बैंक के उतने चक्कर काट रहा है जितने पहले काटता था। ऋण तो दूर, बैंक उसे ऐसी प्रक्रिया में उलझा देती है की वह स्वरोजगार शुरू करने का विचार ही छोड़ देता है।

राज्य सरकार द्वारा आयोजित प्रतियोगी परीक्षाओं का तो भगवान ही मालिक है। हर दूसरी परीक्षा विवादों में फंस जाती है और साथ ही लटक जाता है युवाओं का भविष्य। सरकार फिर भी कहती है यहाँ रोजगार की कमी नहीं है। शायद इसलिए वह अब दूसरे प्रदेश के युवाओं पर मेहरबानी करने के लिए शिक्षाकर्मियों और नर्सों के पदों को आउटसोर्स करने विज्ञापन निकलती है।

यदि राजधानी में कोई युवा और वो भी दिव्यांग रोजगार के आभाव में अपनी जीवनलीला समाप्त करने का प्रयास करता है तो इसका अर्थ है ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी भयावह होगी। प्रदेश में किसानों द्वारा सिलसिलेवार आत्महत्या के मामले किसी से छुपे हुए नहीं हैं। मनरेगा में यदि सबको 150 तक कम मिलता है तो लोग भरी तादाद में पलायन नहीं करते। युवा भारत के निर्माण का सपना साकार करने के लिए सरकारों को जमीनी हकीकत से पहले दो-चार होना पड़ेगा और यह सुनिश्चित करना पड़ेगा कि वो युवा जो रोजगार के आभाव में आत्महत्या कर लेते हैं या अपराधी बन जाते हैं उन्हें अपने पैरों में खड़े होने का कैसे मौका दिया जाए जिससे वे समाज में सम्मानपूर्वक जीवनयापन कर सकें।

Wednesday, May 11, 2016

Why self-declared seculars silent over Aditya killing?

Yogesh Mishra
May 11, 2016
Rocky Yadav kills Class XIIth teenager Aditya Sachdeva with Italian pistol in broad daylight, but nobody from the self-declared sympathy-pouring secular fold utters anything against the barbaric act. Why? Just because it happened in Nitish Kumar's Bihar and not in any BJP-governed state?
Boy-Boy!! What a double standard! What happened to teary-eyed Rahul Gandhi, Arvind Kejriwal and rest of the political crowd who claim that they couldn't resist crying at the sight people's suffering, although by "The People" they mean those who detest BJP.
Aditya's father wants Rocky Yadav to be hanged as he rightly says that the latter won't remain in jail for more than six months. Why the secular lot not supporting Aditya's father? This bunch created much hue and cry when Rohith Vemulla committed suicide. Vemulla left a letter behind. He didn't blame anybody for his extreme step. Contrarily, Aditya didn't kill himself, it was Rocky who shot the lad down.
This is a cold-blooded murder. You ask common mass and they would say Rocky should be hanged. But a section of politicos with secular badge tattooed on their foreheads would oppose Rocky's execution. Yes, some of them had opposed execution of terrorist Afjal Guru.
Till what period the people will endure the politics of convenience by these opportunists? Enough is enough. We don't want double-talk anymore. You can't decide to raise voice for Rohit vemulla, Mohammad Akhlaq who was lynched by mob in Dadri and JNU poster-boy Kanhaiyya Kumar and pose silence on Kaliachak riot (Malda district, West Bengal) and lynching of Delhi (Vikaspuri, West Delhi) dentist Dr Pankaj Narang.
Forget politics. Here, it's a matter of justice. And who wants justice? A family who lost its 19-year-old son who was brutally killed by a person who believes in trampling common mass because he considers them as sheer burden on earth.
Democracy will test these self-declared secular people at every juncture. They can's escape, howsoever hard they try to do so. People already know how selfish this secular brigade is but they are displaying tremendous amount of tolerance. Once the water level exceeds, the flood would be devastating and none of the feigning lot would survive to brag anymore.

Friday, April 1, 2016

जनप्रतिनिधियों का वेतन मोह

योगेश मिश्रा
April 01, 2016
रायपुर

लोकतंत्र में विपक्ष कोतवाल की भूमिका में होता है। वह सरकार की हर गलती पर गिद्ध जैसी पैनी दृष्टि रखता है। इधर सत्तापक्ष चूका नहीं, उधर विपक्ष हावी हो जाता है। संसद हो या विधान सभा, सरकार को किसी भी मुद्दे पर विपक्ष की सहमती हासिल करने के लिए  अच्छी-खासी मशक्कत करनी पड़ती है। परन्तु एक विषय ऐसा भी है जिसपर सरकार और विपक्ष "तू डाल-डाल, मैं पात-पात" वाली कहावत को चरितार्थ करते नज़र आते हैं - जनप्रतिनिधियों का वेतन। दरअसल जनसेवा की भावना से ओतप्रोत राजनीति में कदम रखने वाले जनप्रतिनिधि वेतन के मामले में कोई समझौता नहीं करते - फिर चाहे किसान सूखे की मार से मर रहे हों अथवा देश-प्रदेश की माली हालत खस्ता हो - वेतन में बढ़ोतरी जरुरी है।

छत्तीसगढ़ विधान सभा में विधायकों के वेतन-भत्ता-पेंशन आदि से सम्बंधित चार विधेयक मिनटों में पारित हो गए परन्तु कांग्रेस के निलंबित विधायक अमित जोगी ने इस मुद्दे को सूखा-पीड़ित किसानों की भावनाओं से जोड़कर एक नई बहस छेड़ दी है कि जो प्रदेश

किसान-आत्महत्या मामले में देश में चौथे पायदान पर चढ़ गया है और सरकार धान-बोनस के मामले में किसानों को साल-दर-साल छल रही है, वहां विधायकों की वेतन वेतन-वृद्धि कितनी जायज़ है।

वैसे तो जनप्रतिनिधियों की वेतन-वृद्धि कोई नई बात नहीं है, परन्तु विरोध में उत्पन्न स्वर अनेक प्रश्न खड़ा करते हैं - फिर भले ही विरोधियों की मंशा इसके आड़ में अपनी राजनैतिक पृष्ठभूमि मजबूत करने की हो अथवा अस्तित्व बचाने की।

यदि सुधारवाद के इस दौर में अफसर/कर्मचारियों की पदोन्नति और वेतन-वृद्धि के लिए परिणाम-मूलक प्रदर्शन को मानदंड बनाया जा सकता है तो यही सूत्र सांसदों और विधायकों के लिए क्यों नहीं अपनाया जाता? यदि जनप्रतिनिधियों को वेतन दिया जा रहा है तो उनकी जवाबदेही भी तय करनी होगी।

जिन क्षेत्रों से जनप्रतिनिधि चुनकर आते हैं, वहां उनके द्वारा किये गए कार्य और लाये गए बदलाव के आधार पर ही उनकी वेतन-वृद्धि का दर तय किया जाना चाहिए। हालात तो यह है कि सांसद और विधायक अपने क्षेत्र के लिए आबंटित निधि का भी सदुपयोग नहीं कर पाते।

इन जनप्रतिनिधियों के लिए कृषि व् किसान केवल राजनैतिक मुददे भर रह गए हैं, वर्ना क्या कारण है कि एक तरफ तो केंद्र और राज्य सरकारों ने योजनाओं का पिटारा खोलकर रखा हुआ है और दूसरी तरफ देश भर में किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं? यदि जनप्रतिनिधि सक्रीय होते तो क्या वे अपने क्षेत्र के किसानों को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं दिलाते – फिर चाहे वह समय पर फसल बीमा दिलाने की बात हो या फसल नुकसान होने की अवस्था में दूसरी फसल लेने के लिए सोसाइटीयों से खाद-बीज दिलाने की? राजनैतिक नारों से किसानों का भला नहीं होगा, उनके लिए जमीनी स्तर पर कार्रवाई दिखना चाहिए।

राष्ट्रिय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार पिछले 15 वर्षों में देश में करीब डेढ़ लाख किसानों ने आत्महत्या की है और इसके मुख्य कारण हैं – आर्थिक तंगी, कर्ज और खराब फसल।

किसान-आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र और तेलंगाना पहले और दूसरे स्थान पर हैं तथा मध्य प्रदेश तीसरे पर। जब महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ में किसानों की दुर्गति देखकर नाना पाटेकर सरीखे अभिनेता उनकी मदद के लिए आगे आ सकते हैं तो वेतन लेने वाले सांसद और विधायक अपने क्षेत्र में यह कार्य क्यों नहीं कर सकते?

केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार शहरों और गाँवों की तस्वीर बदलना चाहती है। इसके लिए स्मार्ट सिटी और सांसद आदर्श ग्राम योजना प्रारंभ की गई है। मोदी चाहते हैं सांसद गाँवों को गोद लें और वहां विकास के नए पैमाने स्थापित करें। इसी तर्ज पर छत्तीसगढ़ ने विधायक आदर्श ग्राम योजना प्रारंभ की है। गाँवों की स्थिति तभी सुधरेगी जब किसान आर्थिक रूप से मजबूत होंगे। इसके लिए वेतन-वृद्धि की चाहत रखने वाले सांसदों और विधायकों को कमर कसकर काम करना होगा, कागजों में विकास की गति का आंकलन करने से कुछ नहीं होगा।

केंद्र व् राज्य सरकारों को भी चाहिए कि वे गैर-जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों की वेतन-वृद्धि सहित सभी सुविधाएँ उसी तरह रोक दें, वैसे ही जैसे निजी संस्थानों में होता है। वेतन का मोह है तो काम करें। यदि समय रहते जनप्रतिनिधियों को उनकी जिम्मेदारी का आभास नहीं कराया गया तो उनके बढ़ते वेतन के साथ-साथ आत्महत्या करने वाले किसानों की तादाद भी बढती जाएगी।

Wednesday, March 30, 2016

हंसा तो मोती चुगे: राजनीति में शुचिता चापलूसों के सहारे?!


योगेश मिश्रा 

मार्च ३०२०१६ 



छत्तीसगढ़ भाजपा की कार्यकारिणी घोषित हो गई है। कुछ लोगों का कहना है कि भाजपा के आला नेताओं ने इसमें देरी कर दीहालाँकि यह समझ से परे है कि यही घोषणा यदि पहले हो जाती तो सत्ताधारी दल में ऐसा कौन सा बदलाव आ जाता जिससे प्रदेश में उसकी राजनैतिक स्थिति और मजबूत हो जाती। 

राजनैतिक दलों में कार्यकारिणी का कितना महत्त्व हैयह सभी जानते हैं। कार्यकारिणी का गठन ही संगठन को सुचारू रूप से चलाने के लिए किया जाता हैहालाँकि इसमें काम करने वाले गिने-चुने लोग होते हैंनिर्णय लेने वाले दोतीन या चार और बाकि सब केवल ठूंसे जाते हैं। 

छत्तीसगढ़ भाजपा की कार्यकारिणी में भी ठूंसे हुए चापलूस सीना तानकर ऐसे घूम रहे हैं जैसे उन्होंने कोई जंग जीत ली हो। इन चापलूसों को न राजनीति का ज्ञान है और न ही जनसेवा से सरोकार। इनमें से कुछ तो विधायक और सांसद बनने का भी स्वप्न देख रहे हैं। क्या भाजपा इन्हीं चापलूसों के दम पर राजनीति में शुचिता लाने की बात कर रही है?

Saturday, March 26, 2016

How come #Vikaspuri and #Dadri lynching cases different?

Yogesh Mishra

March 26, 2016

Not long ago, the so-called intellectuals had dubbed entire India as intolerant and accused Centre for playing communal game. The dissenting voices were heard from all corners of the country. It happened in wake of Dadri lynching case. Suddenly, the litterateurs and artistes had discovered sensitive soul inside them and they started returning their awards in protest. They said they did so after hearing voice of their conscience. Fair enough. Now, will they show similar sentiments in Dr Pankaj Narang's lynching in Vikaspuri, Delhi? No. Because, they know there is no scope to drag the Centre into vicious game again in Narang's episode. Why, just because Narang was a Hindu? Or, the idiot bunch is well aware that the Center was never in the scene - neither in Vikaspuri, nor in Dadri?

Boy! The entire game is of playing a politics of convenience for own advantage. That time, the hue and cry on Dadri helped anti-BJPians to insert Muslim card in Bihar polls and they succeeded in obtaining anticipated result by doing so, although there were other factors, too, which played deciding role in swinging the voters from Bhagwa brigade to Lalu-Nitish combine.

In Narang's case, the secular and intellectual lot predicted the outcome beforehand. In fact, they knew that there is no such card called Hindu card in Indian politics and nobody is going to get benefited by it in ensuing elections in four states and one union territory.

Pankaj Narang was ruthlessly killed in front of his house and in presence of his family members at Vikaspuri in Delhi. The incident followed his heated exchange with two persons in motorcycle as the latter threatened him of dire consequences.

Narang first made a couple of calls to police for help, but the great Delhi police couldn't respond because of busy network. He then rushed to Janakpuri district centre with hope to catch a PCR van, but the destiny had something else for him on March 23, 2016 night.

Nine people dragged Narang from his home and thrashed him with sticks and rods till his death. Since four out of nine were juveniles, the Delhi court sent them to correctional home while the remaining five were sent to Tihar jail.

Now see who were the five adults – Naseer, Maesar, Amir, Ameer and Gopal. The secular politicians (apparently the self-declared bastions of democracy) and idiotic bunch of intellectuals took a sigh of relief that nobody can now give the incident a communal hue as there were both Hindus and Muslims among accused. Nobody knows the fifth accused Gopal was actually Gopal or somebody else.

Strange! They cry and shout for Akhlaq, they cry and shout for Rohith Vemula, but they become stolid when Pankaj Narang dies. What a hypocrisy? How come their emotions burst for some and vanish for others? Similar is attitude of the media – it gives hype to some incidents and downplays others.

Its high time India identified the hypocrites and presstitutes so that they may not play with its emotions and disturb the communal harmony in future.


Tuesday, February 2, 2016

Politics on suicides

Yogesh Mishra

February 02, 2016

Chhattisgarh is suddenly witnessing spurt in suicide cases. Majority of the people, who have ended their lives, were young. As expected, the politicians grabbed the issue and have started slamming the government for failing to create conducive atmosphere for youth to survive, evolve, work and flourish. Now, the ground is ready for national players to play political Holi by taking up the issue to higher level and draw the eyeballs from every nook and corner of the country with sole intention to brighten their career.

Being expert in this game of opportunism, Congress scion Rahul Gandhi, Aam Aadmi Party chief Arvind Kejriwal, the Leftists, TMC's Derek O'Brien and his ilk and many more self-proclaimed gear-changers of the society are expected to instantly fly to Raipur and kick-start the drama from dharna to rally to bandh.

But what if there won't be any dalit or tribal card for them? They will certainly be disappointed because nobody is interested in raising voice for the people belonging to general category. In fact, it is the SC/ST or minority angle that is trending in the country nowadays. Rohit Vemula is the latest example. He wouldn't have received such massive support pan India, had he been a general student. While Vemula's background, his lifestyle and political inclinations are still being debated, Rahul Gandhi went on to the extent of comparing him with Mahatma Gandhi.

Fair enough, Rahul Gandhi might have done it to express his strong feelings for Vemula. But will he or anybody else remember Vemula after conclusion of assembly elections in five states this year? Perhaps not or never. When the politicians forget their vision document (or poll manifestos), on the basis of which they contest elections, then how come they will remember anything anybody else?

So, the game is all about profit and loss. The politicians will only take pain to set tone for youngsters (who committed suicide in Chhattisgarh) when they would foresee long-term political gains from their Raipur visit. They are least interested in rationalizing youth and instilling fighting spirit in them. Public awareness is venom for them. They rather want an anarchic, fragmented and dead society as fodder.

Monday, February 1, 2016

Kejriwal and corruption


Yogesh Mishra

February 01, 2016

It seems Arvind Kejriwal's achche din (good days) are numbered now. Reason? The firebrand BJP leader Subramanian Swamy has now trained guns towards him after giving nightmares to Sonia and Rahul Gandhi. This time, Swamy hints of exposing Kejriwal's graft connections.

Swamy accuses Kejriwal of illegally favouring SKN Associates Limited during his first tenure, precisely speaking - when the RTI-activist-turn-politician was Delhi CM for 49 days.

Swamy claims that SKN Associates Limited was a VAT defaulter company, but managed to bag several contracts during Kejriwal's regime as its four subsidiary companies had donated Rs two crore (Rs 50 lakh each) to Aam Aadmi Party earlier.

So, will the self-proclaimed altruist tender his resignation on moral grounds as he had been seeking from others who faced corruption charges?

Perhaps not. In fact, he shunned ethics and values after wearing political cloak. He is no more an ordinary human being, but has turned into a shrewd politician now.

He would rather blame the saffron brigade of playing vendetta politics against him for his series of jibes against PM Narendra Modi on different issues.


Friday, January 29, 2016

Malda violence: Has Mamta secured Muslim votebank?


Yogesh Mishra

January 29, 2016

Mamta Banerjee thinks except TMC, rest all other parties are playing politics on harrowing and eyeopening communal violence in Malda. This is the same lady who had launched tirade against Centre in the aftermath of Dadri lynching case. She had persistently demanded justice for Akhlaq family. Now, when her own backyard is bloodstained due to communal clashes, all her secular talks vanished and she is dubbing the entire incident as mere brawl.

Is that so Mamta? But what are you hiding back in Malda? Why aren't you allowing other political parties to take even sneak peak of the ground reality there? And what are you afraid of? Why do you want us to see Malda violence through your and Derek O Brian's perspectives? And how come Malda is inaccessible for the rest of the world, but not for the presstitutes who are telecasting/publishing stark lie about the ghastly epsiode?

As assembly elections are in air in West Bengal, its apparent that you don't want any political party to take mileage of Malda violence. Ironically, you aren't ashamed in jumping in the filthy game and taking political mileage of Dalit student's suicide in Hyderabad and therefore you instantly send a team led by O Brian to mark TMC's attendance in the Hyderabad central University's campus as another sympathiser of Rohith Vemulla.


We know how desperate you are to secure both Muslim and Dalit votebanks in WB for upcoming elections which would certainly be an acid test for you after you emerged as the most intolerant, impatient and tyrannical leader of the state. However, being a seasoned politican, you must be conscious that sometime votebank politics too fail to click when electorates decide to exercise their franchise on the parameters of development.  

ऊँची दूकान, फीके पकवान

योगेश मिश्रा
January 29, 2016
रायपुर

पिछले १५ वर्षों में छत्तीसगढ़ ने देश में वो कर दिखाया जो बहुत से प्रदेश छह दशकों में नही कर सके। अल्प समय में ही इस प्रदेश ने कमोबेश हर क्षेत्र में राष्ट्रिय स्तर का पुरस्कार जीता। फिर क्या वजह रह गई कि सरकार ने शहरों को संवारने में कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई? आज देश में २० शहरों को स्मार्ट सिटी के लिए चुना गया परन्तु छत्तीसगढ़ द्वारा प्रस्तावित रायपुर और बिलासपुर पहले ५० शहरों में भी नही हैं। बड़े शर्म की बात है। प्रदेश तरक्की कर रहा है परन्तु शहर जस के तस हैं।

अन्य शहरों की बात छोड़िये, राजधानी रायपुर तक अभावग्रस्त है। सड़कें कम हैं, ट्रैफिक अधिक। बजबजाते हुए नाले और नाली नरेंद्र मोदी सरकार के स्वच्छ भारत के स्वप्न को दुस्वप्न में बदलने के लिए आतुर दिखते हैं। उद्योगों और वाहनों ने हवा में जहर घोल दिया है और जीवन नरक बना दिया है, लेकिन सरकार गौरव पथ बनाकर, चौक-चौराहों का सौन्दर्यीकरण करके शहरों को लन्दन और पेरिस के समकक्ष बनाने की बात करती है।

शहरों में वास्तव में मूलभूत सुविधा है कहाँ? न गर्मियों मे पर्याप्त पीने का पानी न बरसात में जलनिकास की व्यवस्था। विकास पर राजनीति इतनी हावी रहती है कि साल भर सरकार और नगरीय निकाय आपस में ही भिड़े रहते हैं। सभी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी मढ़ते रहते हैं। मिलकर काम करने की इच्छाशक्ति ही नहीं है। जब हालात ही ऐसे हैं, तो परिणाम अनुकूल कहाँ से आएंगे? एक कुनबा बनाने के लिए तो पीढियां लग जाती हैं, एक शहर को स्मार्ट बनाने के लिए कुछ तो बलिदान करना होगा, कुछ राजनेताओं को करना होगा, कुछ आम जनता को..

Monday, January 25, 2016

कांग्रेस की बौखलाहट


योगेश मिश्रा

जनवरी २५,२०१६

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस बौखलाई हुई है। अंतागढ़ टेपकाण्ड से कई चौंकाने वाले खुलासे होने के बावजूद सोनिया और राहुल गाँधी धृतराष्ट्र की भांति मौन धारण किये हुए हैं। प्रदेश नेतृत्व के आग्रह के बावजूद वे दल में ध्रुवीकरण की राजनीति करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने में परहेज कर रहे हैं। उनके रुख से यह प्रतीत होता है कि छत्तीसगढ़ उनकी प्राथमिकता सूची में कहीं नही है।

वर्तमान में सोनिया व् राहुल का पूरा ध्यान दस राज्यों में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों पर केन्द्रित है। जाहिराना तौर पर उनकी मंशा पहले भारतीय जनता पार्टी को देश के अन्य भागों में मजबूत होने से रोकने की है, फिर भले ही इस कसरत में छत्तीसगढ़ में प्रदेश संगठन कमजोर रह जाए। गाँधी परिवार की यही उदासीनता प्रदेश नेतृत्व को साल रही है।

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पिछले बारह वर्षों से सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाने की बात कह रहा है, हालाँकि निभा नहीं पा रहा है। कारण साफ़ है - जब जब यह दल मजबूत होने की दिशा में अग्रसर होता है, इसके अपने नेता इसे विखंडित कर देते हैं। दरअसल, कांग्रेस में अनुशासन मजाक बनकर रह गया है। कार्रवाई केवल प्रभावहीन चेहरों के विरुद्ध होती है, प्रभावशाली नेताओं को अभयदान दे दिया जाता है।

हालाँकि गाँधी परिवार की चुप्पी का दूसरा पहलु भी है। वह अनुशासन के नाम पर असंतुष्ट व् विद्रोही नेताओं को फौरी तौर पर दल से बाहर निकालने में यकीन नहीं रखता। यदि ऐसा होता तो पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस से कई बड़े चेहरे साफ़ हो जाते - फिर चाहे वो दिग्विजय सिंह हों, कैप्टन अमरिंदर सिंह या संजय निरुपम। छत्तीसगढ़ के मामले में भी सोनिया व् राहुल धैर्य बरत रहे हैं। अब देखना यह है कि यह रवैय्या प्रदेश कांग्रेस के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है या हानिकारक।


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