Friday, January 29, 2016

Malda violence: Has Mamta secured Muslim votebank?


Yogesh Mishra

January 29, 2016

Mamta Banerjee thinks except TMC, rest all other parties are playing politics on harrowing and eyeopening communal violence in Malda. This is the same lady who had launched tirade against Centre in the aftermath of Dadri lynching case. She had persistently demanded justice for Akhlaq family. Now, when her own backyard is bloodstained due to communal clashes, all her secular talks vanished and she is dubbing the entire incident as mere brawl.

Is that so Mamta? But what are you hiding back in Malda? Why aren't you allowing other political parties to take even sneak peak of the ground reality there? And what are you afraid of? Why do you want us to see Malda violence through your and Derek O Brian's perspectives? And how come Malda is inaccessible for the rest of the world, but not for the presstitutes who are telecasting/publishing stark lie about the ghastly epsiode?

As assembly elections are in air in West Bengal, its apparent that you don't want any political party to take mileage of Malda violence. Ironically, you aren't ashamed in jumping in the filthy game and taking political mileage of Dalit student's suicide in Hyderabad and therefore you instantly send a team led by O Brian to mark TMC's attendance in the Hyderabad central University's campus as another sympathiser of Rohith Vemulla.


We know how desperate you are to secure both Muslim and Dalit votebanks in WB for upcoming elections which would certainly be an acid test for you after you emerged as the most intolerant, impatient and tyrannical leader of the state. However, being a seasoned politican, you must be conscious that sometime votebank politics too fail to click when electorates decide to exercise their franchise on the parameters of development.  

ऊँची दूकान, फीके पकवान

योगेश मिश्रा
January 29, 2016
रायपुर

पिछले १५ वर्षों में छत्तीसगढ़ ने देश में वो कर दिखाया जो बहुत से प्रदेश छह दशकों में नही कर सके। अल्प समय में ही इस प्रदेश ने कमोबेश हर क्षेत्र में राष्ट्रिय स्तर का पुरस्कार जीता। फिर क्या वजह रह गई कि सरकार ने शहरों को संवारने में कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई? आज देश में २० शहरों को स्मार्ट सिटी के लिए चुना गया परन्तु छत्तीसगढ़ द्वारा प्रस्तावित रायपुर और बिलासपुर पहले ५० शहरों में भी नही हैं। बड़े शर्म की बात है। प्रदेश तरक्की कर रहा है परन्तु शहर जस के तस हैं।

अन्य शहरों की बात छोड़िये, राजधानी रायपुर तक अभावग्रस्त है। सड़कें कम हैं, ट्रैफिक अधिक। बजबजाते हुए नाले और नाली नरेंद्र मोदी सरकार के स्वच्छ भारत के स्वप्न को दुस्वप्न में बदलने के लिए आतुर दिखते हैं। उद्योगों और वाहनों ने हवा में जहर घोल दिया है और जीवन नरक बना दिया है, लेकिन सरकार गौरव पथ बनाकर, चौक-चौराहों का सौन्दर्यीकरण करके शहरों को लन्दन और पेरिस के समकक्ष बनाने की बात करती है।

शहरों में वास्तव में मूलभूत सुविधा है कहाँ? न गर्मियों मे पर्याप्त पीने का पानी न बरसात में जलनिकास की व्यवस्था। विकास पर राजनीति इतनी हावी रहती है कि साल भर सरकार और नगरीय निकाय आपस में ही भिड़े रहते हैं। सभी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी मढ़ते रहते हैं। मिलकर काम करने की इच्छाशक्ति ही नहीं है। जब हालात ही ऐसे हैं, तो परिणाम अनुकूल कहाँ से आएंगे? एक कुनबा बनाने के लिए तो पीढियां लग जाती हैं, एक शहर को स्मार्ट बनाने के लिए कुछ तो बलिदान करना होगा, कुछ राजनेताओं को करना होगा, कुछ आम जनता को..

Monday, January 25, 2016

कांग्रेस की बौखलाहट


योगेश मिश्रा

जनवरी २५,२०१६

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस बौखलाई हुई है। अंतागढ़ टेपकाण्ड से कई चौंकाने वाले खुलासे होने के बावजूद सोनिया और राहुल गाँधी धृतराष्ट्र की भांति मौन धारण किये हुए हैं। प्रदेश नेतृत्व के आग्रह के बावजूद वे दल में ध्रुवीकरण की राजनीति करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने में परहेज कर रहे हैं। उनके रुख से यह प्रतीत होता है कि छत्तीसगढ़ उनकी प्राथमिकता सूची में कहीं नही है।

वर्तमान में सोनिया व् राहुल का पूरा ध्यान दस राज्यों में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों पर केन्द्रित है। जाहिराना तौर पर उनकी मंशा पहले भारतीय जनता पार्टी को देश के अन्य भागों में मजबूत होने से रोकने की है, फिर भले ही इस कसरत में छत्तीसगढ़ में प्रदेश संगठन कमजोर रह जाए। गाँधी परिवार की यही उदासीनता प्रदेश नेतृत्व को साल रही है।

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पिछले बारह वर्षों से सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाने की बात कह रहा है, हालाँकि निभा नहीं पा रहा है। कारण साफ़ है - जब जब यह दल मजबूत होने की दिशा में अग्रसर होता है, इसके अपने नेता इसे विखंडित कर देते हैं। दरअसल, कांग्रेस में अनुशासन मजाक बनकर रह गया है। कार्रवाई केवल प्रभावहीन चेहरों के विरुद्ध होती है, प्रभावशाली नेताओं को अभयदान दे दिया जाता है।

हालाँकि गाँधी परिवार की चुप्पी का दूसरा पहलु भी है। वह अनुशासन के नाम पर असंतुष्ट व् विद्रोही नेताओं को फौरी तौर पर दल से बाहर निकालने में यकीन नहीं रखता। यदि ऐसा होता तो पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस से कई बड़े चेहरे साफ़ हो जाते - फिर चाहे वो दिग्विजय सिंह हों, कैप्टन अमरिंदर सिंह या संजय निरुपम। छत्तीसगढ़ के मामले में भी सोनिया व् राहुल धैर्य बरत रहे हैं। अब देखना यह है कि यह रवैय्या प्रदेश कांग्रेस के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है या हानिकारक।


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